अंबे माता: अंबिका के रूप में जगत की माँ

अंबे माता: अंबिका के रूप में जगत की माँ

‘अंबे’ माँ को पुकारने का आत्मीय संबोधन है। अलग संदर्भों में भक्त इसी नाम से अंबिका, दुर्गा या पार्वती का स्मरण करते हैं। अंबे माता कोई असंबद्ध परिवार में जन्मी अलग देवी नहीं हैं; उनकी कथा दिव्य माता की परंपराओं से जुड़ी है।

देवताओं की पुकार और अंबिका

देवीमाहात्म्य में शुंभ और निशुंभ देवताओं के अधिकार छीन लेते हैं। देवता देवी की शरण जाते हैं। इसी प्रसंग में पार्वती के स्वरूप से कौशिकी प्रकट होती हैं और अंबिका का असुरों से सामना होता है।
देवताओं की स्तुति में देवी को बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, दया और जीवन की अनेक अवस्थाओं में स्थित कहा जाता है। इसी प्रसंग में पार्वती पूछती हैं कि वे किसकी स्तुति कर रहे हैं और कौशिकी प्रकट होती हैं। उनका आश्रय संसार से दूर कोई शक्ति नहीं है। माता उन क्षमताओं में पहले से उपस्थित हैं जिनसे प्राणी जीवन जीते हैं। आगे का संघर्ष उसी पोषणकारी उपस्थिति के आह्वान से जुड़ता है।
असुर अपने धन और सत्ता के आधार पर देवी को भी प्राप्त करना चाहते हैं। देवी स्वयं को उनकी संपत्ति मानने से इनकार करती हैं। संघर्ष में उनका सिंह, काली और शक्ति के अन्य स्वरूप भाग लेते हैं।
शुंभ का दूत उसके अधिकार में आई संपदा का वर्णन करता है और देवी से उसे अथवा उसके भाई को स्वीकार करने को कहता है। देवी उत्तर देती हैं कि उन्होंने प्रण किया है—जो उन्हें युद्ध में परास्त करे, वही विवाह का अधिकारी होगा। दूत की धमकी से उत्तर नहीं बदलता। युद्ध आरंभ होने से पहले ही इस संवाद में उनका अपना निर्णय स्पष्ट सुनाई देता है।
धूम्रलोचन उन्हें बलपूर्वक लाने भेजा जाता है, पर वह परास्त होता है और देवी का सिंह उसकी सेना का सामना करता है। चंड-मुंड के आने पर काली का प्राकट्य और चामुंडा नाम का प्रसंग जुड़ता है। रक्तबीज अपने गिरते रक्त से नए योद्धा उत्पन्न करके अलग संकट लाता है। बदलते विरोधी समझाते हैं कि देवी की शक्तियाँ भिन्न रूप क्यों लेती हैं। हर रूप एक विशिष्ट संकट का उत्तर है, एक ही विजय की पुनरावृत्ति नहीं।

अनेक स्वरूपों में एक माता

शुंभ जब दूसरे रूपों की सहायता का आरोप लगाता है, देवी सभी शक्तियों को अपने में समेट लेती हैं। अंतिम विजय अनेक रूपों के पीछे एक ही शक्ति का बोध कराती है। देवता जीवन के अनेक रूपों में उपस्थित माता की स्तुति करते हैं।
शक्तियों का देवी में लौटना शुंभ से अंतिम सामना तैयार करता है। जिसने कहा था कि देवी दूसरों पर निर्भर हैं, वह अब उसी एक उपस्थिति के सामने है जिससे वे रूप प्रकट हुए थे। उसके पतन के बाद ग्रंथ संसार के फिर शांत होने का वर्णन करता है। संघर्ष का उद्देश्य असुरों की संपदा पा लेना नहीं था, बल्कि सबको प्रभावित करने वाली अव्यवस्था दूर करना था। जीवन का फिर सहज चल पाना माता की विजय की पहचान बनता है।
गुजरात और अन्य क्षेत्रों में अंबे की पुकार नवरात्रि, गरबा और घर की आरती से विशेष रूप से जुड़ी है। अंबाजी जैसे मंदिरों की अपनी पवित्र कथाएँ हैं; उनके नाम और स्थानीय संदर्भ को बनाए रखना चाहिए।
अंबे नाम विराट युद्धकथा को माँ की आत्मीय पुकार तक ले आता है। उनकी कथा संरक्षण और निरंतर सान्निध्य में पूर्णता पाती है। आरती और गरबा में माता की विजय उनके निकट होने के सामूहिक उत्सव में बदल जाती है।

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