जय भैरवी माता, जय जय भैरवी माता।
त्रिभुवन की हो स्वामिनी, भक्तन सुखदाता
जय भैरवी माता
लाल वस्त्र धारण करती हो, मुण्डमाल गल सोहे।
त्रिनेत्र तुम्हारा जगमगाए, जगत मन को मोहे
जय भैरवी माता
चार भुजाओं में शस्त्र धारे, अभय वरद देती।
भक्त जनों के भय हर लेती, मोक्ष पथ देती
जय भैरवी माता
नाद ब्रह्म की तुम अधिकारी, वाणी सिद्धि देती।
मूक जन को वरदान मिलै, माँ सरस्वती सी लेती
जय भैरवी माता
कमल आसन पर विराजमान, दिव्य छटा तुम्हारी।
पद्मराग मणि कुण्डल साजे, छवि अति प्यारी
जय भैरवी माता
शिव के वाम अंग में रहती, अर्धांगिनी कहावे।
शक्ति और शिव के संयोग से, सृष्टि चक्र चलावे
जय भैरवी माता
दश महाविद्या में तुम शोभित, परम शक्ति अपारा।
तन्त्र मन्त्र की तुम शिरोमणि, जगत को उजियारा
जय भैरवी माता
योगिनी सिद्धा सदा सेवें, भैरव संग राजे।
श्मशान में भी दिव्य रूप धर, आनन्द में साजे
जय भैरवी माता
रोग शोक दारिद्र्य हर लो माँ, भक्त शरण आए।
तेरे दर पर जो भी आया, कभी न पछताए
जय भैरवी माता
भूत प्रेत का भय नहिं रहता, नाम तुम्हारा लेत।
शत्रु पराजित होत सभी, माँ विजय को देत
जय भैरवी माता
जो नर आरती भैरवी माँ की, श्रद्धा से गाए।
माँ की कृपा सदा बरसे, मनचाहा वह पाए
जय भैरवी माता
जय भैरवी माता, जय जय भैरवी माता।
त्रिभुवन की हो स्वामिनी, भक्तन सुखदाता

