भैरवी माता, जिन्हें त्रिपुर भैरवी भी कहते हैं, शाक्त परंपराओं की दस महाविद्याओं में पूजित हैं। उनके नाम का संबंध शिव के उग्र भैरव स्वरूप से है। वे दिव्य माता का रूप हैं; उनके माता-पिता और बचपन का कोई एक सर्वमान्य मानव जीवनवृत्त नहीं है।
देवी के दस रूप
महाविद्याओं की एक प्रचलित उत्पत्ति-कथा दक्ष के यज्ञ से पहले सती और शिव के संवाद से जुड़ी है। शिव के हटने का प्रयास करने पर देवी अपने प्रचंड रूप प्रकट करती हैं। भैरवी को इसी शक्ति-विस्तार में स्मरण किया जाता है। अन्य परंपराओं में महाविद्याओं का क्रम और प्राकट्य अलग ढंग से समझाया जाता है।
कथा देवी की पूर्णता का बोध कराती है। उनका स्वरूप केवल सौम्यता तक सीमित नहीं है; उग्र रूप भी उनकी विद्या और शक्ति के अंग हैं।
इस परंपरागत कथा में दक्ष का यज्ञ महत्वपूर्ण संदर्भ है। सती पिता के आयोजन में जाना चाहती हैं और शिव वहाँ होने वाले अनादर को समझते हैं। इसी मतभेद में देवी के अनेक रूपों का उद्घाटन होता है। महाविद्याएँ ऐसी शक्तियाँ सामने लाती हैं जिन्हें सती को केवल किसी की पुत्री या पत्नी मानकर सीमित नहीं किया जा सकता। भैरवी माता की स्वतंत्र दिव्य सत्ता के इसी प्रकाशन का अंग हैं।
दस रूप ऐसी दस साधारण बहनें नहीं हैं जिनके जीवन को पारिवारिक कालक्रम में रख दिया जाए। उनके नाम ज्ञान के भिन्न मार्ग खोलते हैं—उग्र, सौम्य, तेजस्वी, तपस्वी और अप्रत्याशित। इस समूह में भैरवी की पहचान तीव्रता और कठिनाई से होकर आगे बढ़ने के संकल्प से होती है। उनका विस्तार इसी प्राकट्य और उसके भक्तिपरक अर्थ में मिलता है, काल्पनिक बाललीलाएँ जोड़ने में नहीं।
साधना का तेज
भैरवी का परिचित ध्यान लाल आभा, जपमाला, पुस्तक और अभय तथा वर देने वाले हाथों से जुड़ा है। ये चिह्न अध्ययन, जप और निरंतर साधना का भाव व्यक्त करते हैं। कुछ स्वरूपों में अधिक उग्र आयुध और चिह्न हैं; परंपरा के अनुसार रूप बदलता है।
पुस्तक और माला उस रूप को शांत दिशा भी देते हैं जिसका नाम पहले सुनने पर भयावह लग सकता है। पुस्तक अध्ययन की ओर बुलाती है और माला बार-बार स्मरण में लौटने का संकेत देती है। वरदान और अभय की मुद्राएँ भक्त को निकट आने का निमंत्रण देती हैं। इन चिह्नों के कारण प्रतिमा केवल क्रोध की छवि नहीं रहती। अज्ञान का सामना करने वाली शक्ति सीखने के धैर्यपूर्ण कार्य को भी सँभालती है।
भक्तिपरक वर्णन में उनकी लाल आभा की तुलना उगते सूर्य से की जाती है। यह तुलना जागरण के तेज को व्यक्त करती है। ध्यान की व्याख्या में भैरवी उस बात को पूरी चेतना के सामने लाती हैं जिसे व्यक्ति टालता रहा हो। उनके हाथों की वस्तुएँ साधक से ईमानदारी और स्थिरता की अपेक्षा दिखाती हैं। इस प्रकार शांत प्रतिमा भी प्राकट्य की कथा को आगे कहती रहती है।
तप से उनका संबंध उपासना में एकाग्रता और दृढ़ता का अर्थ लाता है। अज्ञान, चंचलता और आसक्ति को भी साधना की बाधाओं के रूप में समझा जाता है। यह आध्यात्मिक व्याख्या है, कोई अलग युद्धकथा नहीं जिसके लिए काल्पनिक घटनाक्रम जोड़ा जाए।
त्रिपुर भैरवी और त्रिपुरसुंदरी अलग महाविद्याओं के नाम हैं। उन्हें एक-दूसरे के स्थान पर नहीं रखना चाहिए। भैरवी का वर्णन रूपांतरकारी विद्या के रूप में माता के निरंतर सान्निध्य तक पहुँचता है; उसका आधार उनकी पवित्र पहचान है।

