देवीमाहात्म्य में शुंभ-निशुंभ की सेना से युद्ध के दौरान काली माता प्रकट होती हैं। चंड और मुंड के आगे बढ़ने पर अंबिका के ललाट से उनका उग्र, श्याम स्वरूप निकलता है। यह उनका एक प्रमुख शास्त्रीय प्राकट्य है, मानव परिवार में सामान्य जन्म की कथा नहीं।
चामुंडा नाम
काली चंड और मुंड का सामना करके उनका वध करती हैं। इस विजय के बाद देवी उन्हें चामुंडा नाम देती हैं। इस नाम में दोनों असुरों पर विजय की स्मृति बनी रहती है।
देवीमाहात्म्य में काली का प्राकट्य उस समय होता है जब अंबिका के सामने शत्रुसेना खड़ी है। क्रोध से गहरे हुए देवी के ललाट से उग्र रूप निकलकर संघर्ष में प्रवेश करता है। चंड और मुंड देवी पर अधिकार करने की शुंभ की इच्छा के प्रतिनिधि थे। उनका पराभव देवी को बलपूर्वक अपने अधिकार में लेने के प्रयास का उत्तर है। चामुंडा नाम उसी विशेष हस्तक्षेप की स्मृति रखता है, किसी अलग बाल्यकाल अथवा मानवजीवन की नहीं।
रक्तबीज के विस्तार को रोकना
रक्तबीज का संकट अलग था। उसके रक्त की हर बूँद धरती पर गिरते ही उसके समान नया योद्धा उत्पन्न करती थी। केवल प्रहार करने से शत्रु और बढ़ता जाता था। चंडिका के निर्देश पर काली रक्त को धरती पर गिरने से रोकती हैं और उससे बने असुरों को ग्रसती हैं। तब देवी रक्तबीज को परास्त करती हैं।
रक्तबीज का संकट स्पष्ट होने तक मातृकाएँ युद्ध में उतर चुकी होती हैं। हर चोट से एक शत्रु अनेक बन सकता है। इसलिए केवल साहस से, बिना उपाय बदले, संघर्ष समाप्त नहीं हो सकता। काली रक्त को भूमि तक पहुँचने से रोकती हैं। देवी और उनकी शक्तियाँ साथ कार्य करती हैं, तब रणभूमि में नए विरोधियों का उत्पन्न होना रुकता है। यहाँ काली की उग्रता का निश्चित उद्देश्य है—ऐसे संकट को रोकना जो साधारण प्रहार से और बढ़ता जाता है।
भक्तिपरक व्याख्याओं में रक्तबीज को उन प्रवृत्तियों की छवि भी माना गया है जो विवेक के बिना प्रतिक्रिया करने पर बढ़ती हैं। यह युद्ध का आध्यात्मिक अर्थ है, मूल कथा के स्थान पर दूसरी घटना नहीं। दोनों दृष्टियों में काली उस कारण की ओर ध्यान देती हैं जिससे संकट बार-बार लौटता है। इस प्रकार उग्र चित्रण के भीतर सूझबूझ का स्थान भी बना रहता है।
यह युद्धकथा का विशिष्ट प्रसंग है। इसे शिव पर खड़ी काली की बाद की कथाओं के साथ एक ही घटना मानकर नहीं मिलाना चाहिए। उस स्वरूप की अपनी भक्तिपरक व्याख्याएँ हैं।
उग्र स्वरूप में माँ
शाक्त परंपराएँ काली को काल से परे माता के रूप में भी पूजती हैं। लोकप्रिय बाद की कथाओं में शिव उनके मार्ग में लेटते हैं और उन्हें पहचानने पर उनकी प्रचंड गति रुकती है। इस चित्र की कथाएँ और अर्थ परंपरा के अनुसार बदलते हैं।
शिव के साथ वाली प्रतिमा में भक्त प्रबल दिव्य ऊर्जा और उसे धारण करने वाली शांति का मिलन देखते हैं। बंगाल की प्रचलित व्याख्याओं में बाहर निकली जिह्वा को पहचान और संकोच से जोड़ा जाता है, जबकि अन्य शाक्त अर्थ भी मिलते हैं। एक ही व्याख्या प्रतिमा के सारे भाव नहीं समेटती। मातृभक्ति में महत्वपूर्ण बात यह है कि इस उग्र रूप के निकट भी विश्वास से जाया जा सकता है। माँ कहकर पुकारने वाले को जीवन के भय और वियोग को छिपाना नहीं पड़ता।
उनका भयावह रूप ही उनकी पूरी पहचान नहीं है। बंगाल के भक्तिगीतों और घरों की पूजा में उन्हें संतान के स्नेह से माँ कहा जाता है। उनकी कथा संकट के संहार और मातृआश्रय को साथ रखती है; वह किसी मानवीय मृत्यु पर समाप्त नहीं होती।

