भगवान कुबेर की पूजा धन, समृद्धि, वैभव और आर्थिक स्थिरता की प्राप्ति के लिए की जाती है। कुबेर देव को देवताओं का कोषाध्यक्ष और धन के अधिपति माना जाता है। श्रद्धा और सच्चे मन से की गई कुबेर पूजा जीवन में सुख, संपन्नता और सकारात्मक ऊर्जा लाती है।
तैयारी
प्रातः स्नान करके स्वच्छ और साफ वस्त्र धारण करें
पूजा स्थान को अच्छी तरह साफ करें
भगवान कुबेर की मूर्ति या चित्र को स्वच्छ आसन पर स्थापित करें
उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें
मन को शांत और एकाग्र रखें
आवश्यक सामग्री
भगवान कुबेर की मूर्ति या चित्र
पीले या लाल फूल
अगरबत्ती
घी का दीपक
कुमकुम
हल्दी
चंदन
अक्षत (चावल)
फल
मिठाई
नारियल
कमलगट्टा
धन या सिक्के
जल पात्र
संकल्प
शांत मन से बैठकर पूजा का संकल्प लें
धन, समृद्धि और परिवार की खुशहाली की प्रार्थना करें
कुबेर देव से आर्थिक स्थिरता और सफलता की कामना करें
ध्यान
नेत्र बंद करके भगवान कुबेर का स्मरण करें
उनके दिव्य, तेजस्वी और समृद्ध स्वरूप का ध्यान करें
कुछ समय तक मन को मंत्र जाप में एकाग्र रखें
आवाहन
भगवान कुबेर को पूजा स्वीकार करने हेतु आमंत्रित करें
‘ॐ कुबेराय नमः’ मंत्र का 11 या 21 बार जाप करें
आसन एवं पाद्य
पुष्प अर्पित करके भगवान को आसन समर्पित करें
शुद्ध जल अर्पित कर स्वागत करें
स्नान
मूर्ति पर स्वच्छ जल अर्पित करें
इच्छानुसार दूध या पंचामृत से स्नान कराकर पुनः जल से शुद्ध करें
अलंकार
हल्दी, कुमकुम और चंदन अर्पित करें
फूल और अक्षत चढ़ाएं
सिक्के या धन भगवान कुबेर के सामने रखें
नैवेद्य
फल, मिठाई और नारियल अर्पित करें
भक्ति भाव से भोग स्वीकार करने की प्रार्थना करें
धूप एवं दीप
अगरबत्ती जलाकर धूप अर्पित करें
घी का दीपक प्रज्वलित करें
मंत्र जाप
‘ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये नमः’ मंत्र का जाप करें
इच्छानुसार 108 बार मंत्र जाप करें
आरती
भगवान कुबेर की आरती गाएं
दीपक को गोलाकार घुमाकर श्रद्धा भाव से आरती करें
प्रदक्षिणा
मूर्ति या पूजा स्थान की 1 या 3 बार परिक्रमा करें
प्रणाम
भगवान कुबेर को प्रणाम करके आशीर्वाद प्राप्त करें
धन, वैभव और समृद्धि की प्रार्थना करें
प्रसाद वितरण
मिठाई और फल प्रसाद रूप में वितरित करें
महत्वपूर्ण निर्देश
भगवान कुबेर की पूजा विशेष रूप से धनतेरस, दीपावली और शुक्रवार को अत्यंत शुभ मानी जाती है। पूजा में उत्तर दिशा का विशेष महत्व होता है। कुबेर पूजा के साथ माता लक्ष्मी की पूजा करना भी शुभ माना जाता है। विधि से अधिक श्रद्धा, स्वच्छता और सच्ची भक्ति का महत्व होता है।

