यमुना माता सूर्य और संज्ञा की पुत्री तथा यम की बहन के रूप में स्मरण की जाती हैं। उनका एक नाम कालिंदी है। उनकी कथा दिव्य परिवार, हिमालय से निकली नदी और ब्रज में कृष्ण के आत्मीय जीवन को जोड़ती है।
कृष्णजन्म की रात नदी पार करना
नवजात कृष्ण को मथुरा से गोकुल ले जाते हुए वसुदेव यमुना के तट पर पहुँचे। भागवत में नदी द्वारा उन्हें मार्ग देने का वर्णन है। भक्तिपरक कथाएँ बालक के चरण छूने की यमुना की इच्छा को भी स्नेह से सुनाती हैं। मुख्य प्रसंग कृष्ण के सुरक्षित नंद के घर पहुँचने तक चलता है।
वसुदेव उस बालक को कंस की हिंसा से बचाने के लिए ले जा रहे थे। रात और वर्षा के बीच यह यात्रा राजा का ध्यान आकर्षित किए बिना पूरी करनी थी। नदी का मार्ग देना उन संरक्षणकारी घटनाओं में है जिनसे कृष्ण सुरक्षित व्रज पहुँचते हैं। आगे बाललीलाओं की अनेक स्मृतियाँ इसी जल के आसपास जुड़ेंगी। जो स्थान पहले कठिन पारावार लगता है, वही बाद में मित्रता और खेल का संसार बनता है।
कालिय के विष से मुक्ति
बाद में कालिय नाग के विष से नदी का एक भाग संकटपूर्ण हो गया। कृष्ण जल में उतरे और उसके फनों पर नृत्य करके उसे वश में किया। नागपत्नियों की प्रार्थना पर उन्होंने कालिय को जीवनदान देकर वहाँ से जाने को कहा। इससे नदी फिर प्राणियों के लिए सुरक्षित हुई।
कालिय के प्रसंग का आरंभ विषैले जल से होता है जो आसपास के जीवन के लिए संकट बन गया था। कृष्ण सर्प की कुंडली में दिखाई न देने पर व्रजवासी भय से तट पर आ जाते हैं। उनका दुःख कथा में उतना ही महत्वपूर्ण है जितना बाद में कालिय के फनों पर हुआ नृत्य। नदी सबके जीवन का साझा आधार है; उसमें आया संकट पूरे समुदाय को एक स्थान पर ले आता है।
पति के परास्त होने पर नागपत्नियाँ कृष्ण से प्रार्थना करती हैं। उनके निवेदन से दया का अवसर खुलता है। कालिय को मार देने के स्थान पर वहाँ से चले जाने का आदेश मिलता है। उसके हटने पर जल विष से मुक्त होता है। संरक्षण और संयम साथ दिखाई देते हैं तथा नदी और उससे जुड़े प्राणियों को फिर जीवन मिलता है। व्रज की आगे की आनंदमय स्मृतियों में यमुना इस पुनर्जीवन को भी सँजोती हैं।
यमुना तट पर गोचारण, बाँसुरी और गोपियों की भक्ति की लीलाएँ भी जुड़ी हैं। इसलिए ब्रज में उनकी पहचान केवल नदी पार करने या कालियदमन के एक प्रसंग तक सीमित नहीं है।
कालिंदी का संकल्प
भागवत के एक बाद के प्रसंग में कृष्ण और अर्जुन सूर्यपुत्री कालिंदी से मिलते हैं। वे विष्णु को पति रूप में पाने के लिए तपस्या कर रही हैं। कृष्ण उन्हें स्वीकार करते हैं और वे उनकी रानियों में स्थान पाती हैं। वैष्णव परंपरा उन्हें यमुना देवी से जोड़ती है।
कालिंदी अर्जुन को बताती हैं कि वे किसलिए प्रतीक्षा कर रही हैं। उन्होंने भगवान को पति के रूप में चुना है और इच्छा पूरी होने तक यमुना में पिता द्वारा दिए गए निवास में रहती हैं। अर्जुन उनकी बात कृष्ण तक पहुँचाते हैं। इस प्रकार कथा में व्यक्त संकल्प, धैर्यपूर्ण साधना और उसके स्वीकार का क्रम है। नदीदेवी केवल कृष्ण के कार्यों की पृष्ठभूमि नहीं रहतीं; उनकी अपनी भक्ति और इच्छा भी सामने आती है।
यमुना की कथा कृष्ण और उनके तट पर रहने वालों से निरंतर संबंध के रूप में आगे बढ़ती है। उस आत्मीय स्मृति के साथ नदी के जल और तटों की रक्षा का दायित्व भी जुड़ता है।

