भैरव बाबा शिव के उग्र स्वरूप के रूप में पूजित हैं। काशी में वे नगर के कोतवाल और रक्षक माने जाते हैं। काल, उत्तरदायित्व और संरक्षण से उनका संबंध उनकी कथा को विशिष्ट बनाता है।
ब्रह्मा के पाँचवें मस्तक का प्रसंग
एक पौराणिक कथा में ब्रह्मा के अभिमान से जुड़े विवाद के बीच भैरव का प्राकट्य और ब्रह्मा के पाँचवें मस्तक का छेदन होता है। अलग पाठों में इस घटना की भूमिका भिन्न है। कपाल भैरव से चिपक जाता है और वे उसे भिक्षापात्र के रूप में लेकर विचरण करते हैं। कथा इस कर्म के परिणाम और प्रायश्चित्त का भी वर्णन करती है।
काशीखंड में यह प्रसंग परम सत्ता के विषय में हुए विवाद के भीतर आता है। शिव का अनोखा बाहरी रूप देखकर उनका महत्व न पहचाना जाना विवाद का एक कारण बनता है। भैरव का प्राकट्य उस अभिमान को तोड़ता है और अपराध से जुड़ा मस्तक अलग होता है। फिर भी कथा तुरंत उस कर्म का परिणाम सामने रखती है। अभिमान का सामना करने वाले भैरव को स्वयं कपाल धारण करना पड़ता है। शक्ति के साथ उत्तरदायित्व भी कथा में बना रहता है।
इस वर्णन में ब्रह्महत्या एक मूर्त रूप लेकर भैरव के पीछे चलती है। भैरव सामना समाप्त होते ही विजेता की तरह एक स्थान पर नहीं बैठ जाते। वे यात्रा करते हुए शिव की नगरी तक आते हैं। काशी पहुँचने पर स्थिति बदलती है—पीछा छूटता है और कपाल का भार उतरता है। कपालमोचन इस लंबे प्रायश्चित्त के बाद मिली मुक्ति की स्मृति को सँजोता है।
काशी पहुँचने पर कपाल से मुक्ति मिलती है। यह प्रसंग कपालमोचन से जुड़ा है। इस तरह कथा केवल दंड का वर्णन नहीं करती; उग्र दिव्य स्वरूप के साथ कर्म के उत्तरदायित्व का भाव भी सामने आता है।
काशी के कोतवाल
काशी की जीवंत परंपरा में काल भैरव पवित्र नगर के संरक्षक हैं। उनके स्वरूप के साथ श्वान का संबंध प्रसिद्ध है। अन्य परंपराओं में अष्टभैरव जैसे समूहों की आराधना होती है, और स्थानीय मंदिरों की अपनी कथाएँ तथा नाम हैं।
काशी के कोतवाल नाम से उनकी भूमिका नगर के परिचित शब्दों में समझ में आती है। कोतवाल सीमा और व्यवस्था की देखभाल करता है; भक्त इसी संबोधन से काशी के प्रति भैरव के संरक्षण और आचरण की गंभीरता को व्यक्त करते हैं। उनके मंदिर के दर्शन नगर के पवित्र जीवन से जुड़ने का अंग माने जाते हैं। इसलिए उनका उग्र मुख किसी स्थान और उसके लोगों से अलग नहीं है। उसमें आश्रय, सजगता और उत्तरदायित्व का संबंध निहित है।
भैरव के साथ दिखाई देने वाला श्वान भी इस भक्तिपरंपरा का परिचित अंग है। अनेक समुदायों में कुत्तों के प्रति दया और उन्हें भोजन देना भैरव-भक्ति से जुड़ा है। ऐसा व्यवहार श्रद्धा को किसी जीव की देखभाल में व्यक्त करता है। भैरव की स्मृति केवल भय नहीं जगाती; वह संयम के साथ करुणा और सजगता की ओर भी ले जा सकती है।
भैरव की कथा किसी मानवीय मृत्यु के स्थान पर उनके निरंतर रक्षक रूप में आगे बढ़ती है। भक्त उनके सामने संरक्षण और मर्यादा का भाव लेकर आते हैं। वैष्णो देवी की यात्रा-कथा के भैरोंनाथ उसी विशिष्ट कथा के पात्र हैं; दोनों को बिना संदर्भ के एक ही जीवनकथा का व्यक्ति नहीं मानना चाहिए।

