गणेश जी: पार्वती के पुत्र, गजानन और बुद्धि के देवता

गणेश जी: पार्वती के पुत्र, गजानन और बुद्धि के देवता

गणेश जी शिव और पार्वती के पुत्र हैं। उनके जन्म की एक प्रसिद्ध कथा में पार्वती अपने शरीर के उबटन से एक बालक बनाती हैं और उसे द्वार की रक्षा करने को कहती हैं। माँ की आज्ञा पर अडिग रहने वाले इसी बालक को आगे चलकर हाथी का मस्तक प्राप्त होता है और वे शिव के गणों के अधिपति गणपति कहलाते हैं।

पार्वती के द्वार पर बालक गणेश

शिवपुराण की प्रसिद्ध कथा में पार्वती एक ऐसा सेवक चाहती हैं जो उनकी आज्ञा का पालन करे। वे अपने शरीर के उबटन से बालक का निर्माण करती हैं, उसे जीवन देती हैं और स्नान के समय द्वार की रक्षा का दायित्व सौंपती हैं। बालक के लिए माँ की आज्ञा ही सबसे बड़ा कर्तव्य है। शिव के आने पर भी वह उन्हें भीतर जाने से रोक देता है। उस समय दोनों उस सम्बन्ध को नहीं जानते जो आगे पिता और पुत्र के रूप में स्वीकार किया जाएगा।
द्वार का विवाद युद्ध में बदल जाता है। शिव के गण बालक को सरलता से पराजित नहीं कर पाते और संघर्ष में अन्य देवशक्तियाँ भी सम्मिलित होती हैं। अन्ततः बालक का सिर काट दिया जाता है। यह जानकर पार्वती शोक और क्रोध से व्याकुल हो उठती हैं। वे अपने पुत्र को पुनर्जीवित करने की माँग करती हैं। कथा बालक की मृत्यु पर समाप्त नहीं होती; अब देवताओं के सामने उसे वापस जीवन देने का प्रश्न है।

गजमुख और गणपति का पद

हाथी का मस्तक लाकर बालक के शरीर पर लगाया जाता है और उसे पुनः जीवित किया जाता है। शिव उसे पुत्र के रूप में स्वीकार करते हैं तथा अपने गणों का अधिपति बनाते हैं। इसी प्रसंग में गणपति और गणेश नामों का महत्त्व सामने आता है। शुभ कार्य और पूजा के आरम्भ में उनकी आराधना का वरदान भक्तों के जीवन में उनकी विशिष्ट उपस्थिति का आधार बनता है। संकट से आरम्भ हुई घटना परिवार में स्वीकार और पुनर्मिलन तक पहुँचती है।
गणेश के जन्म के सभी विवरण हर पुराण और क्षेत्रीय कथा में एक जैसे नहीं हैं। पार्वती द्वारा प्रयुक्त पदार्थ तथा गजमुख प्राप्त होने के प्रसंग के अलग रूप भी मिलते हैं। इसलिए द्वार पर रक्षा करने वाले बालक की कथा को अत्यन्त प्रचलित आख्यान के रूप में पढ़ना चाहिए, सभी परम्पराओं का एकमात्र विवरण मानकर नहीं। इसमें निष्ठा, संघर्ष, माता का दुःख और पुत्र की पुनः प्राप्ति भावनात्मक क्रम बनाते हैं।

माता-पिता में सम्पूर्ण संसार

एक अन्य कथा में गणेश और उनके भाई कार्तिकेय को पृथ्वी की परिक्रमा करने का कार्य दिया जाता है। शिवपुराण के विवाह-प्रसंग में कार्तिकेय यात्रा पर निकलते हैं, जबकि गणेश शिव और पार्वती का पूजन करके उनकी परिक्रमा करते हैं। वे माता-पिता की सेवा और सम्मान को पृथ्वी की परिक्रमा के पुण्य से जोड़कर अपना तर्क रखते हैं। यहाँ उनकी बुद्धि केवल किसी प्रतियोगिता को जीतने में नहीं, उसके आशय को समझने में दिखाई देती है।
लोकप्रिय कथाओं में यही प्रतियोगिता कभी विवाह के स्थान पर ज्ञानफल से जुड़ी होती है। इन रूपों का अन्तर समझना आवश्यक है। गणेश का विवेक और कार्तिकेय का उत्साह दोनों भाइयों के अलग स्वभाव को सामने लाते हैं। इस प्रसंग से किसी एक देवता की उपासना को कमतर नहीं माना जाना चाहिए। कार्तिकेय की अपनी विस्तृत लीलाएँ और दक्षिण भारत सहित अनेक क्षेत्रों में अत्यन्त समृद्ध भक्ति-परम्पराएँ हैं।

व्यास, लेखन और एकदन्त की कथा

एक बाद की व्यापक रूप से प्रचलित परम्परा में व्यास महाभारत बोलते हैं और गणेश उसे लिखते हैं। निरन्तर लेखन की शर्त के साथ अर्थ समझकर लिखने की शर्त जुड़ती है। यह प्रसंग श्रवण, एकाग्रता और विचार का सम्बन्ध दिखाता है। महाभारत की सभी पाठ-परम्पराओं में यह आख्यान नहीं मिलता। टूटा हुआ दन्त लेखनी बनने की कथा भी इसी विस्तृत लोकस्मृति का अंग है; एकदन्त होने के अन्य विवरण अलग कथाओं में आते हैं।

हर आरम्भ में गणेश का स्मरण

गजमुख, वक्र सूँड, एक दन्त और मूषक से गणेश का स्वरूप सहज पहचाना जाता है। भक्त इन चिह्नों में ध्यान से सुनने, विवेक से कार्य करने और अहंकार को संयमित रखने की प्रेरणा देखते हैं। ये भक्तिपरक व्याख्याएँ हैं, सभी स्थानों पर एक ही अर्थ में मान्य कोई निश्चित सूची नहीं। गणेश चतुर्थी में घर और सार्वजनिक पण्डाल उनके स्वागत, पूजा, प्रसाद और विदाई से भर जाते हैं। उनकी कथा किसी अन्तिम मृत्यु पर समाप्त नहीं होती; हर नए आरम्भ में भक्त उनके साथ अपने सम्बन्ध को फिर से स्मरण करता है।

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