ॐ जय गरुड़ देवा, प्रभु जय गरुड़ देवा।
विष्णु वाहन सुखकारी, निज भक्तन सेवा॥
॥ ॐ जय गरुड़ देवा… ॥
पंख विशाल तिहारे, वेग अतिशय भारी।
सुर-असुर सब कांपत, देख गति तुम्हारी॥
॥ ॐ जय गरुड़ देवा… ॥
अमृत कुंभ लाये, देवों को सुख दीन्हा।
नागों का मद उतारा, पाताल में कीन्हा॥
॥ ॐ जय गरुड़ देवा… ॥
कश्यप ऋषि के नंदन, विनता के प्यारे।
दुष्टों को संहारे, भक्तन के सहारे॥
॥ ॐ जय गरुड़ देवा… ॥
पीतांबर धारी, पीत मुकुट शोभा।
कमंडल हाथ सोहत, मन को अति मोहा॥
॥ ॐ जय गरुड़ देवा… ॥
गरुड़ पुराण रच्यो, ज्ञान की धारा।
मोक्ष मार्ग दिखलाओ, भव सिंधु पारा॥
॥ ॐ जय गरुड़ देवा… ॥
जो नर आरती गावे, श्रद्धा मन लाये।
गरुड़ कृपा से तर जाए, भव बंधन जाए॥
॥ ॐ जय गरुड़ देवा… ॥
यह आरती पूर्ण करे, सब कष्ट हरे।
सुख-संपत्ति बढ़े घर, भक्ति से भरे॥
॥ ॐ जय गरुड़ देवा… ॥

