॥ दोहा ॥
जय गरुड़ वाहन विष्णु के,पक्षीराज महान।
तुम्हरी कृपा से मिटत है,भय भव बाधा त्रान॥
सर्प दमन करि देव को,दिया अमृत कलश आन।
नमन करूँ पद पद्म को,हरो विघ्न हर ध्यान॥
॥ चौपाई ॥
जय जय गरुड़ देव महाराज।पक्षिराज तुम भव भय काज॥
विष्णु वाहन परम पवित्र।तुम्हरो नाम अखिल सुचरित्र॥
स्वर्णिम पंख विशाल तुम्हारे।चमकत रवि ज्यों नभ उजियारे॥
तीखी दृष्टि बली बलवाना।तीनों लोक करो तुम ज्ञाना॥
कश्यप ऋषि के पुत्र कहाये।विनता माता ने तुम्हें जाये॥
अण्ड फोड़ प्रकटे जग माँही।ब्रह्माण्ड हिला नभ काँपि जाही॥
माता की सेवा हित धाये।इन्द्र लोक से अमृत लाये॥
सर्प बन्धन माता कर मोची।पराक्रम की यह सबसे ऊँची॥
इन्द्र का वज्र लगा तन माँही।रंचक भी विचलित तुम नाहीं॥
एक पंख टूटा तिस काले।नाम पड़ा श्री सम्पाती वाले॥
नागन को तुम खात निहारो।विष का प्रभाव सब दूर टारो॥
विष भय ते जो ध्यावे तुमको।भय नहिं रहत कबहुँ उसको॥
श्री हरि के वाहन तुम ठाने।ब्रह्मा विष्णु महेश बखाने॥
सुदर्शन चक्र संग उड़ जाते।शत्रु दल को पल में मिटाते॥
गरुड़ पुराण तुम्हरे नाम।ज्ञान मोक्ष देत बिना विराम॥
जो नर पढ़े सुने मन लाई।पाप दोष सब जाय मिटाई॥
श्याम वर्ण हरि तुमसे भाये।नील গগन में संग उड़ाये॥
देव दानव मुनि सब गावें।गरुड़ देव को शीश नवावें॥
सात द्वीप नव खण्ड तुम जानो।चौदह भुवन तुम्हरो बखानो॥
एक पल में पहुँचो तुम जाहाँ।आदेश हो श्री हरि कहाँ॥
नाग लोक पर किया था धावा।अमृत कुम्भ हाथ में पावा॥
सर्पों के भय को हरने वाले।भक्तों के संकट टालने वाले॥
रामायण में आये तुम काम।लक्ष्मण प्राण बचाये राम॥
नागपाश से मुक्ति दिलाई।गरुड़ देव की महिमा छाई॥
तुम्हरो वेग पवन से न्यारा।सूर्य किरण सम तेज तुम्हारा॥
मेघनाद के नागपाश भारी।गरुड़ काटे क्षण में सारी॥
भक्त जनन के संकट हरता।कष्ट दूर करि मंगल करता॥
जो ध्यावे तुमको प्रति दिन।दुःख दारिद्र्य हो जाये क्षीन॥
सर्पदंश भय रोग निवारो।गरुड़ नाम लेत संकट टारो॥
विष ज्वर तन ते दूर भगाओ।भक्त जनों को स्वस्थ बनाओ॥
तीनों सन्ध्या जो तुम्हें ध्यावे।मन इच्छित फल वह सब पावे॥
घर में सुख शान्ति सदा रहे।गरुड़ कृपा से दुःख न सहे॥
शत्रु बाधा हो दूर तुरन्ता।गरुड़ स्तुति ते मिले आनन्दा॥
कोर्ट कचहरी में जय होई।गरुड़ भक्त को हाने न कोई॥
तन्त्र मन्त्र के भय को भागो।गरुड़ स्मरण से पाप न लागो॥
काल कवलित भय हर लेते।गरुड़ भक्त को अभय देते॥
जन्म मृत्यु के भव भय भारे।गरुड़ स्मरण से पार उतारे॥
मोक्ष द्वार खुलवाते तुम।परम धाम दिखलाते तुम॥
विनता नन्दन पक्षीराजा।सेवत हरि करत निज काजा॥
देवन के देव सब पूजें।गरुड़ नाम बिन काज न सूझें॥
वेद पुराण महिमा गाई।नेति नेति कहि मुनि अकुलाई॥
तुम्हरी लीला अगम अपारा।नहिं जानत कोई छोर किनारा॥
श्रद्धा भक्ति सहित जो गावें।परम पद को वे नर पावें॥
घर परिवार सुखी हो जाई।गरुड़ कृपा नित बनी रहाई॥
धन धान्य घर भर भर आवे।भक्त जनों की इच्छा पावे॥
ऋण रोग शत्रु सब मिटते।गरुड़ चरण में शीश नवते॥
बाल वृद्ध सब ध्यान धरावें।विपदा में गरुड़ कृपा पावें॥
नित प्रात उठि स्तुति गाओ।घर में मंगल शान्ति मनाओ॥
देव दूत गरुड़ महाराज।हर लो भक्तन के सब काज॥
विष्णु आज्ञा पालक तुम नेता।सुर असुर सब के गुण गेता॥
अन्धकार में ज्योति जलाओ।भटके हुए को राह दिखाओ॥
शरण में आये को अभय दो।कभी न भक्त को विफल करो॥
सुन्दर रूप दिव्य तुम्हारा।पंख फैलाये अति उजियारा॥
मणि माणिक्य जड़ित हैं पंखा।देख देख जग होत न थंका॥
चरण कमल में शीश नवाऊँ।भक्ति भाव से तुम्हें मनाऊँ॥
दास तुम्हारो सदा कहावें।इस जग में सुख चैन को पावें॥
अग्नि जल भूकम्प ते बचाओ।वायु व्याधि का भय मिटाओ॥
चारों दिश से रक्षा करना।भक्त जनों को कभी न डरना॥
सात्विक बुद्धि प्रदान कर देना।मन में निर्मल ज्ञान भर देना॥
विवेक वैराग्य दो तुम हमको।भवसागर से तारो सबको॥
श्री हरि के चरणों में बसते।पर भक्तों के संकट हरते॥
दोनों लोक सुधारो स्वामी।अन्तर्यामी तुम अभिरामी॥
नाग राज को दण्ड दिलाते।अधर्मी को दण्ड चखाते॥
धर्म की रक्षा तुम ही करते।दुष्टों के दल भाग निकलते॥
गरुड़ध्वज जहाँ लहराई।वहाँ सदा हरि भक्ति छाई॥
तुम्हरो ध्वज देखत ही भागें।सब दुष्ट दल पाप पर लागें॥
विष्णु मन्दिर द्वार तुम विराजो।भक्तों के हृदय में तुम गाजो॥
पूजा आरती जो करे नेमा।पाये सुख संपत्ति प्रेमा॥
गरुड़ पंचाक्षर जो जपे।पाप ताप कभी नहिं तपे॥
जय गरुड़ जय गरुड़ उचारे।सब संकट तत्काल निवारे॥
ग्रह दोष पीड़ा हरो हमारी।गरुड़ देव करुणा के धारी॥
नवग्रह के कष्ट को भगाओ।जातक के जीवन को सजाओ॥
मृत्यु भय का नाश करते हो।भक्तों को वैकुण्ठ धरते हो॥
काल यम से भी बड़े हो तुम।मोक्ष मार्ग के गड़े हो तुम॥
एकादशी को जो व्रत राखे।गरुड़ पाठ कर मन में आखे॥
सोलह सोमवार व्रत के साथी।गरुड़ कृपा दे पुण्य के दाथी॥
जो चालीसा पढ़े नित प्रातः।गरुड़ कृपा मिले दिन रातः॥
सात बार जो इसे सुनाये।अटल भाग्य अपना बनाये॥
गरुड़ चालीसा पाठ जो करे।सब मनोरथ उसके सब पूरे॥
विष्णु कृपा गरुड़ कृपा पाई।जन्म जन्म की मुक्ति कमाई॥
॥ दोहा ॥
गरुड़ चालीसा पाठ ते,मिटे विपद सब आय।
विष्णु कृपा संग गरुड़ की,नित नित होत सहाय॥
विनता सुत पक्षीपति,दीन जनन के नाथ।
चरण शरण में रहूँ सदा,थामो मेरो हाथ॥

