गायत्री माता को वेदमाता, गायत्री मंत्र की मूर्त चेतना और बुद्धि को प्रकाशित करने वाली दिव्य जननी के रूप में पूजा जाता है।
देवी गायत्री जी की कथा
देवी गायत्री जिन्हें वेदमाता, देवमाता और विश्वमाता के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में ज्ञान, प्रकाश, पवित्रता और दिव्य चेतना की सर्वोच्च देवी मानी जाती हैं। वे पंचमुखी हैं और उनके पाँच मुख पाँच प्राणों, पाँच तत्वों और पाँच वेदों के प्रतीक हैं। देवी गायत्री को समस्त वेदों की जननी कहा जाता है — उनका गायत्री मंत्र संसार का सबसे प्राचीन, सबसे पवित्र और सबसे शक्तिशाली मंत्र माना जाता है। भक्त उन्हें बुद्धि की देवी, अंधकार को मिटाने वाली दिव्य ज्योति और समस्त पापों का नाश करने वाली परम माता के रूप में पूजते हैं।
सतयुग की बात है। एक बार ब्रह्मा जी ने पुष्कर तीर्थ में एक महान यज्ञ का आयोजन किया। शास्त्रों के अनुसार इस यज्ञ को उचित समय पर संपन्न करना अत्यावश्यक था और यज्ञ में पत्नी का साथ होना अनिवार्य था। परंतु उस समय ब्रह्मा जी की पत्नी सावित्री देवी विलंब से आ रही थीं। देवताओं की प्रेरणा से ब्रह्मा जी ने एक गुज्जर कन्या से विवाह किया, जिन्हें इंद्र ने पवित्र कर दिया। वही दिव्य कन्या गायत्री के नाम से जानी गईं और उन्होंने ब्रह्मा जी के साथ उस महायज्ञ को पूर्ण किया। देवी गायत्री इस प्रकार ब्रह्मा जी की शक्ति और वेदों की माता के रूप में प्रतिष्ठित हुईं।
देवी गायत्री के प्रकट होने की एक और दिव्य कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि सृष्टि के आरंभ में जब चारों ओर अज्ञान और अंधकार था, तब भगवान ब्रह्मा ने तपस्या की। उनकी गहन साधना से प्रसन्न होकर परब्रह्म की शक्ति ने एक दिव्य ज्योति के रूप में प्रकट होकर उन्हें गायत्री मंत्र का ज्ञान दिया। यही दिव्य शक्ति देवी गायत्री हैं। इसीलिए गायत्री मंत्र को समस्त मंत्रों का मूल और वेदों का सार माना जाता है। देवी गायत्री ने ब्रह्मा जी को वह दिव्य ज्ञान दिया जिससे उन्होंने इस सृष्टि की रचना की।
देवी गायत्री पंचमुखी हैं — उनके पाँच मुख क्रमशः श्वेत, नीले, पीले, लाल और हरे रंग के हैं, जो पाँच तत्वों — आकाश, जल, पृथ्वी, अग्नि और वायु — के प्रतीक हैं। उनके दस हाथों में कमल, माला, कमण्डल, पुस्तक, त्रिशूल और अभय मुद्रा सुशोभित हैं। वे श्वेत हंस पर विराजमान रहती हैं जो ज्ञान और विवेक का प्रतीक है। उनका रूप दिव्य, तेजोमय और मनोहारी है। उनके दर्शन मात्र से भक्त के मन का अज्ञान दूर हो जाता है और हृदय में दिव्य प्रकाश का उदय होता है।
गायत्री मंत्र की उत्पत्ति की कथा अत्यंत पवित्र है। महर्षि विश्वामित्र ने घोर तपस्या करके देवी गायत्री को प्रसन्न किया। देवी ने प्रकट होकर उन्हें वह दिव्य मंत्र प्रदान किया जो समस्त वेदों का सार है। यही गायत्री मंत्र है — 'ॐ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं। भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।' इस मंत्र का अर्थ है — 'हम उस परम प्रकाशमान, दिव्य सविता देव के तेज का ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित करे।' महर्षि विश्वामित्र ने इस मंत्र को तीनों लोकों में प्रचारित किया।
एक बार देवताओं और असुरों में घोर संग्राम छिड़ा। असुरों के अत्याचार से तीनों लोक त्राहि-त्राहि कर उठे। देवता भगवान ब्रह्मा और विष्णु के पास गए और रक्षा की प्रार्थना की। तब ब्रह्मा जी ने देवी गायत्री का स्मरण किया। देवी गायत्री ने अपने दिव्य तेज से असुरों को परास्त किया और तीनों लोकों में ज्ञान, प्रकाश और धर्म की पुनः स्थापना की। इसीलिए देवी गायत्री को देवमाता कहा जाता है — वे समस्त देवताओं की माता और रक्षक हैं।
एक बार एक निर्धन ब्राह्मण था जो अत्यंत दुखी और पीड़ित था। उसने देवी गायत्री की शरण ली और नित्य गायत्री मंत्र का जाप करने लगा। कुछ ही दिनों में उसकी बुद्धि तीव्र हो गई, उसके कष्ट दूर हुए और उसे वेद-शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त हुआ। वह ब्राह्मण महान विद्वान बना। तभी से यह मान्यता प्रचलित हुई कि गायत्री मंत्र के जाप से बुद्धि, विद्या और आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है। देवी गायत्री अपने भक्तों को अज्ञान से ज्ञान की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु से अमरत्व की ओर ले जाती हैं।
देवी गायत्री और सावित्री का संबंध भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। कुछ शास्त्रों में सावित्री और गायत्री को एक ही शक्ति के दो स्वरूप माना गया है। सावित्री वह शक्ति हैं जो प्राण की रक्षा करती हैं और गायत्री वह शक्ति हैं जो बुद्धि और ज्ञान को प्रकाशित करती हैं। ब्रह्मा जी की तीन पत्नियाँ — सरस्वती, सावित्री और गायत्री — वास्तव में एक ही आदि शक्ति के तीन रूप हैं। गायत्री उनमें से सबसे तेजस्वी और वेदों की जननी मानी जाती हैं।
देवी गायत्री जी का आध्यात्मिक महत्व
देवी गायत्री की कथा हमें सिखाती है कि ज्ञान ही सबसे बड़ी शक्ति है। अज्ञान ही दुख का मूल कारण है और देवी गायत्री की उपासना से वह अज्ञान दूर होता है। उनका जीवन और महिमा यह संदेश देती है कि जब हम दिव्य प्रकाश और ज्ञान की साधना करते हैं, तो जीवन के समस्त कष्ट स्वतः दूर हो जाते हैं।
1. वेदमाता — समस्त वेदों की जननी
देवी गायत्री को वेदमाता कहा जाता है क्योंकि गायत्री मंत्र समस्त वेदों का सार और मूल है। ऋषि-मुनियों ने माना है कि जो गायत्री मंत्र का अर्थ समझ लेता है, उसे चारों वेदों का ज्ञान स्वतः प्राप्त हो जाता है।
2. ज्ञान और बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी
देवी गायत्री बुद्धि, विवेक और ज्ञान की देवी हैं। गायत्री मंत्र का नित्य जाप करने से बुद्धि तीव्र होती है, स्मरण शक्ति बढ़ती है और मन की चंचलता दूर होती है। विद्यार्थियों के लिए उनकी उपासना विशेष रूप से फलदायी मानी जाती है।
3. दिव्य प्रकाश और तेज की स्रोत
देवी गायत्री सूर्य की अधिष्ठात्री शक्ति हैं। सूर्य जिस प्रकार अंधकार को नष्ट करता है, उसी प्रकार देवी गायत्री अज्ञान, पाप और अंधकार को नष्ट करती हैं। उनकी उपासना से आत्मा में दिव्य तेज और ओज का संचार होता है।
4. पाप-नाशिनी और पवित्रता की देवी
गायत्री मंत्र के जाप से जाने-अनजाने में किए गए समस्त पापों का नाश होता है। देवी गायत्री अपने भक्तों को पवित्र, निर्मल और दिव्य बनाती हैं। वे भक्त के अंतःकरण को शुद्ध करके उसे परमात्मा की ओर प्रेरित करती हैं।
5. देवमाता — समस्त देवताओं की माता
देवी गायत्री समस्त देवताओं की माता हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की शक्तियाँ गायत्री में समाहित हैं। वे त्रिदेवों की सम्मिलित शक्ति का प्रतीक हैं और इसीलिए उन्हें देवमाता कहा जाता है।
6. पंचतत्वों और पंचप्राणों की नियंत्रक
देवी गायत्री के पाँच मुख पाँच तत्वों और पाँच प्राणों के प्रतीक हैं। वे इस सृष्टि के समस्त तत्वों को नियंत्रित और संतुलित करती हैं। उनकी उपासना से शरीर, मन और आत्मा तीनों स्तरों पर स्वास्थ्य और संतुलन प्राप्त होता है।
7. मोक्ष और मुक्ति की दायिनी
देवी गायत्री की उपासना मोक्ष का सर्वोत्तम मार्ग मानी जाती है। गायत्री मंत्र का नित्य जाप करने से भक्त जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होता है और परम मोक्ष को प्राप्त करता है। वे अपने भक्त को अंधकार से प्रकाश और मृत्यु से अमरत्व की ओर ले जाती हैं।
8. स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्रदायिनी
गायत्री मंत्र का जाप न केवल आत्मिक बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभकारी है। ऋषियों और आधुनिक वैज्ञानिकों दोनों ने माना है कि इस मंत्र की ध्वनि तरंगें शरीर और मन को सकारात्मक ऊर्जा से भर देती हैं। देवी गायत्री अपने भक्तों को दीर्घायु और स्वास्थ्य का वरदान देती हैं।
9. संध्या उपासना और त्रिकाल साधना
देवी गायत्री की उपासना तीन संध्याओं — प्रातःकाल, मध्याह्न और सायंकाल — में करने का विधान है। इसे त्रिकाल संध्या कहते हैं। प्रातः सूर्योदय के समय गायत्री मंत्र का जाप विशेष रूप से फलदायी माना जाता है। यह साधना मन को एकाग्र, शांत और दिव्य बनाती है।
10. गायत्री जयंती और पर्व
ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गायत्री जयंती मनाई जाती है। इस दिन देवी गायत्री की विशेष पूजा, हवन और गायत्री मंत्र के जाप का आयोजन किया जाता है। हरिद्वार, पुष्कर और अन्य तीर्थ स्थानों पर इस दिन विशाल धार्मिक आयोजन होते हैं और लाखों भक्त देवी गायत्री की कृपा प्राप्त करते हैं।
निष्कर्ष
देवी गायत्री केवल एक मंत्र की देवी नहीं, बल्कि वे समस्त ज्ञान, प्रकाश, पवित्रता और दिव्य चेतना का सर्वोच्च स्वरूप हैं। वे वेदमाता, देवमाता और विश्वमाता हैं। उनकी उपासना से बुद्धि तीव्र होती है, पाप नष्ट होते हैं, जीवन में प्रकाश आता है और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है। देवी गायत्री हमें यह सिखाती हैं कि ज्ञान ही सबसे बड़ी शक्ति है और दिव्य प्रकाश की साधना ही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है। ॐ गायत्र्यै नमः। जय माँ गायत्री!

