ऋग्वेद में इंद्र वज्रधारी और देवताओं के पराक्रमी रक्षक हैं। बाद की पौराणिक परंपरा उन्हें स्वर्ग का अधिपति बताती है; शची उनकी रानी और ऐरावत उनका हाथी है। उनकी कथाओं में विजय के साथ ऐसे प्रसंग भी हैं जहाँ अधिकार को विनम्रता सीखनी पड़ती है।
वृत्र से संघर्ष
ऋग्वेद 1.32 में जल को रोके हुए वृत्र पर इंद्र की विजय का वर्णन है। वज्र से अवरोध हटाकर वे जलधाराओं को मुक्त करते हैं। इस सूक्त में उनका पराक्रम जल पर निर्भर जीवन को फिर गति देने से जुड़ा है।
बाद के ग्रंथ वृत्र की कथा को और विस्तार देते हैं तथा वज्र को ऋषि दधीचि के त्याग से जोड़ते हैं। इन वर्णनों को अपने-अपने संदर्भ में पढ़ना चाहिए; वे वैदिक सूक्त का बिल्कुल समान पाठ नहीं हैं।
भागवत की बाद की कथा में देवता दधीचि के पास जाते हैं, क्योंकि वृत्र का सामना करने के लिए उनकी अस्थियों से बने अस्त्र की आवश्यकता होती है। यह असाधारण माँग है। ऋषि पहले उन्हें उसके अर्थ पर विचार करने को कहते हैं और फिर नश्वर शरीर को दूसरों के कल्याण में अर्पित करना स्वीकार करते हैं। उनके देहत्याग के बाद विश्वकर्मा वज्र बनाते हैं और इंद्र उसे लेकर युद्ध में जाते हैं। इस प्रकार अस्त्र में किसी अन्य के स्वेच्छा से दिए गए दान की स्मृति रहती है; उसे चलाने वाले का बल अकेले उसका नहीं होता।
भागवत इस युद्ध में विरोधी वृत्र को भी गहरी भक्ति से भरे वचन देता है। युद्ध करते हुए भी उसका अंतर्मन भगवान की ओर है। इसलिए इस प्रसंग को केवल अच्छे विजेता और बुरे शत्रु के सरल विभाजन में नहीं बाँधा जा सकता। ऋग्वैदिक सूक्त के साथ इसे पढ़ने पर दिखाई देता है कि बाद का साहित्य किसी परिचित पात्र को नए विस्तार से सामने ला सकता है। इंद्र की विजय महत्वपूर्ण है, पर उससे प्रतिद्वंद्वी की प्रार्थना मिट नहीं जाती।
गोवर्धन और कृष्ण के सामने विनम्रता
भागवत पुराण में कृष्ण के कहने पर ब्रजवासी गोवर्धन का उत्सव मनाते हैं तो इंद्र क्रोधित होकर प्रचंड वर्षा भेजते हैं। कृष्ण पर्वत उठाकर सबको आश्रय देते हैं। वर्षा समाप्त होने के बाद इंद्र को अपनी भूल का बोध होता है।
वे कृष्ण के पास जाकर प्रार्थना करते हैं और सुरभि के साथ उनका गोविंद रूप में सम्मान करते हैं। कथा उन्हें केवल क्रोधित विरोधी के रूप में नहीं छोड़ती; उसमें पश्चात्ताप और सुधरने का प्रसंग भी है।
इंद्र का क्षमा माँगना इसलिए महत्वपूर्ण है कि वर्षा का प्रकोप उनके पद की शक्ति का प्रदर्शन था। जिन लोगों का जीवन वर्षा से पोषित होना चाहिए था, वही उनके क्रोध का लक्ष्य बन गए। कृष्ण के सामने वे पहचानते हैं कि सम्मान और अधिकार ने उनके विवेक को ढक दिया था। गोविंद का अभिषेक उसी स्वीकार का सार्वजनिक रूप है। देवताओं के राजा भी सीख सकते हैं और अभिमान सुधरने के बाद सेवा की ओर लौट सकते हैं।
वैदिक उपासना में इंद्र का महत्वपूर्ण स्थान बना रहता है। पुराण अलग-अलग कालखंडों के इंद्रों का भी उल्लेख करते हैं। इसलिए इंद्रपद किसी एक मानव जीवन की कहानी तक सीमित नहीं है। उनकी कथाएँ शक्ति के उपयोग और भूल के बाद जिम्मेदारी स्वीकार करने का प्रश्न सामने लाती हैं।

