खाटू श्याम की परंपरा में बर्बरीक घटोत्कच के पुत्र और भीम के पौत्र माने जाते हैं। उनकी माता का नाम प्रचलित कथाओं में मोरवी या मौरवी मिलता है। यह कथा महाभारत से जुड़ी क्षेत्रीय भक्ति परंपराओं में विकसित हुई है; इसे महाभारत के हर पाठ में एक जैसे वर्णित प्रसंग के रूप में नहीं रखना चाहिए।
तीन बाणों वाले वीर
बर्बरीक अत्यंत कुशल योद्धा थे। उनके तीन बाणों को युद्ध का निर्णय करने में समर्थ बताया जाता है। कुरुक्षेत्र जाते समय उन्होंने दुर्बल पक्ष का साथ देने का वचन दिया। कृष्ण ने उनसे पूछा कि यदि उनके बल से कमजोर पक्ष विजयी होने लगे, तो अब कमजोर हो गए दूसरे पक्ष का साथ देने पर क्या होगा? बार-बार पक्ष बदलने से दोनों सेनाओं का विनाश हो सकता था।
पहली बार सुनने पर बर्बरीक का प्रण बहुत उदार लगता है—वे हारते हुए पक्ष के साथ खड़े होंगे। कृष्ण का प्रश्न बताता है कि अपार शक्ति के साथ जुड़ने पर उसी प्रतिज्ञा का परिणाम क्या हो सकता है। बर्बरीक जिस सेना की सहायता करेंगे, दूसरी कमजोर हो जाएगी और फिर उन्हें उसका साथ देना पड़ेगा। इस तरह पक्ष लगातार बदलता रहेगा। इसीलिए कथा में यह संवाद विशेष स्थान रखता है। करुणा से किया गया संकल्प भी अपने परिणामों को समझने वाला विवेक माँगता है।
लोकप्रिय कथा में कृष्ण ने वृक्ष के पत्तों को चिह्नित करने की चुनौती देकर उनकी परीक्षा ली। कृष्ण के पैर के नीचे छिपा पत्ता भी बाण से बच नहीं सका। यह प्रसंग बर्बरीक के असाधारण सामर्थ्य और उनके वचन के परिणाम को स्पष्ट करता है।
शीशदान और श्याम नाम का वरदान
कृष्ण ने बर्बरीक से शीश का दान माँगा। बर्बरीक ने दिव्य उद्देश्य को स्वीकार किया और युद्ध देखने की इच्छा रखी। उनका शीश ऐसे स्थान पर रखा गया जहाँ से वे युद्ध देख सकें। युद्ध के बाद उन्होंने विजय का आधार कृष्ण की शक्ति को बताया।
बर्बरीक की भूमिका योद्धा से साक्षी की हो जाती है। जो वीर युद्ध का निर्णय करना चाहता था, वह अब उसे अपने पराक्रम की उपलब्धि बनाए बिना देखता है। बाद में विजेता जब अपने-अपने योगदान की बात करते हैं, तो उसका उत्तर उनका ध्यान कृष्ण की ओर लौटाता है। इस समर्पण में केवल शस्त्र या सेना में स्थान नहीं छूटता; विजय का मुख्य अधिकारी बनने का भाव भी पीछे रह जाता है।
रणभूमि से खाटू तक
स्थानीय स्थापना-कथा में एक गाय के किसी विशेष स्थान पर दूध छोड़ने का प्रसंग मिलता है। वहीं भूमि में स्थित पवित्र शीश का पता चला और स्थानीय राजा से जुड़े स्वप्न के बाद मंदिर में उसकी पूजा आरंभ हुई। ये विवरण खाटू की श्रद्धापरंपरा का भाग हैं; बाद के मंदिर-निर्माण की तिथियाँ अलग विवरणों में भिन्न मिलती हैं। प्राकट्य-स्थल और मंदिर महाकाव्य की विशाल रणभूमि को उस नगर से जोड़ते हैं जहाँ भक्त श्याम के निकट दर्शन के लिए पहुँचता है।
खाटू की मान्यता के अनुसार कृष्ण ने उन्हें श्याम नाम और कलियुग में पूजित होने का वरदान दिया। आगे की स्थानीय कथा खाटू में उनके पवित्र शीश के मिलने और मंदिर में प्रतिष्ठा से जुड़ती है। भक्त उन्हें ‘हारे का सहारा’ कहते हैं। उनकी कथा का केंद्र अपने बल का गर्व नहीं, कृष्ण के सामने पूर्ण समर्पण है।

