कृष्ण जी: जन्म, ब्रज की लीलाएँ और गीता का उपदेश

कृष्ण जी: जन्म, ब्रज की लीलाएँ और गीता का उपदेश

श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा में देवकी और वसुदेव के यहाँ हुआ। कंस ने दोनों को कारागार में रखा था, क्योंकि उसे देवकी की संतान से अपने अंत की भविष्यवाणी का भय था। जन्म की रात वसुदेव बालक कृष्ण को यमुना पार गोकुल में नंद और यशोदा के घर ले गए।

ब्रज के प्रिय बालक

यशोदा के स्नेह में कृष्ण बलराम के साथ बड़े हुए। भागवत पुराण में उनकी बालक्रीड़ा, माखन चुराने और ग्वाल समुदाय की रक्षा करने के अनेक प्रसंग हैं। उन्होंने पूतना जैसे संकटों से ब्रज को बचाया, यमुना में कालिय का दमन किया और इंद्र की वर्षा से लोगों तथा पशुओं की रक्षा के लिए गोवर्धन उठाया। उनकी बाँसुरी और गोपियों से प्रेम ब्रजभक्ति के केंद्र में हैं। राधा जी का विशिष्ट महत्व बाद की वैष्णव परंपराओं में विस्तार से मिलता है।
एक दिन यशोदा ने शरारती बालक को ऊखल से बाँधना चाहा। वे जितनी रस्सी जोड़तीं, उतनी ही कम पड़ जाती। अंत में कृष्ण ने माता की थकान देखकर स्वयं बँधना स्वीकार किया। दामोदर की इस लीला में असीम प्रभु माँ के स्नेह की पहुँच में आ जाते हैं। एक अन्य प्रसंग में मिट्टी खाने की शिकायत पर यशोदा उनके मुख में पूरा विश्व देखती हैं। फिर भी वह विस्मय उनके मन से अपने बालक की चिंता और ममता को दूर नहीं करता।
गोवर्धन का प्रसंग इसी संरक्षण को पूरे गाँव तक फैलाता है। कृष्ण ने गोपों से पर्वत, गौधन और जीवन को पोषण देने वाले परिवेश का सम्मान करने को कहा। वर्षा का संकट आया तो परिवार अपने पशुओं के साथ उठे हुए पर्वत के नीचे पहुँचे। भागवत में सात दिन के आश्रय का वर्णन है। बाद में इंद्र ने अपनी भूल स्वीकार की और कृष्ण को गोविंद के रूप में सम्मानित किया। इस कथा का अंत केवल वर्षा रुकने में नहीं, अहंकार के शांत होने और संबंध के सुधरने में भी है।

मथुरा से द्वारका तक

बाद में कृष्ण और बलराम मथुरा गए। कृष्ण ने कंस का वध करके माता-पिता को मुक्त कराया। अब उनका दायित्व ब्रज से आगे यादव समुदाय तक फैल गया। द्वारका उनका निवास बनी। रुक्मिणी तथा अन्य रानियों से विवाह की कथाएँ उनके जीवन के इसी चरण से जुड़ी हैं।
रुक्मिणी का प्रसंग कृष्ण के आगे के जीवन में उनकी अपनी इच्छा और निर्णय को सामने लाता है। जिस विवाह के लिए वे सहमत नहीं थीं, उसकी तैयारी देखकर उन्होंने एक ब्राह्मण के माध्यम से कृष्ण को संदेश भेजा। उसमें उन्होंने अपना मन बताया और आने का अनुरोध किया। कृष्ण ने उस पुकार को स्वीकार किया और शिशुपाल से प्रस्तावित विवाह से पहले उन्हें अपने साथ ले गए। द्वारका की इन कथाओं में व्रज का प्रिय बालक अब पति, संबंधी और एक बड़े समुदाय के रक्षक के रूप में दिखाई देता है।

पांडवों के सखा और अर्जुन के सारथी

महाभारत में कृष्ण पांडवों के सहायक और मार्गदर्शक हैं। युद्ध से पहले उन्होंने शांति का प्रयास किया। कुरुक्षेत्र में वे अर्जुन के सारथी बने। जब अर्जुन अपने संबंधियों और गुरुओं के सामने युद्ध करने को लेकर व्याकुल हुए, कृष्ण ने गीता का उपदेश दिया। इसमें कर्तव्य, आत्मज्ञान, भक्ति और फल की आसक्ति छोड़कर कर्म करने का मार्ग बताया गया है।
गीता का आरंभ एक गहरे मानवीय संकट से होता है। अर्जुन दोनों ओर अपने प्रियजनों को देखकर विजय को सरल उपलब्धि नहीं मान पाते। कृष्ण एक लंबे संवाद में उनके प्रश्नों और संदेहों का उत्तर देते हैं। वे कर्म में स्थिरता, बदलते शरीर और आत्मा का विवेक तथा ईश्वर के प्रति प्रेमपूर्ण समर्पण समझाते हैं। सारथी केवल रथ को युद्ध में नहीं ले जाते; वे अर्जुन को यह विचार करने में सहायता देते हैं कि जब हर निर्णय का मूल्य चुकाना पड़े, तब कर्म कैसे किया जाए।
पृथ्वी पर कृष्ण की लीला के अंतिम प्रसंग में जरा अपनी भूल समझकर व्याकुल हो जाता है। कृष्ण उसे आश्वस्त करते हैं। फिर भागवत उनके प्रस्थान और पीछे रह गए लोगों के शोक का वर्णन करता है। यह समय बाललीलाओं से बहुत अलग है, फिर भी भयभीत व्यक्ति के प्रति उनका व्यवहार उसी करुणा को प्रकट करता है।
आगे की कथा में यादव कुल का विनाश और जरा शिकारी के बाण से जुड़े कृष्ण के पृथ्वी से प्रस्थान का प्रसंग आता है। भागवत इसे उनकी पृथ्वी पर लीला की पूर्णता और अपने धाम में प्रवेश के रूप में प्रस्तुत करता है। भक्त उन्हें यशोदा के बालक, ब्रज के रक्षक और गीता के उपदेशक—इन सभी रूपों में स्मरण करते हैं।

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