लक्ष्मी माता: समुद्र मंथन से प्राकट्य और विष्णु का सान्निध्य

लक्ष्मी माता: समुद्र मंथन से प्राकट्य और विष्णु का सान्निध्य

देवताओं और असुरों के समुद्र मंथन से निकले रत्नों के बीच लक्ष्मी माता प्रकट हुईं। भागवत पुराण उनके तेजस्वी रूप और उनकी ओर आकृष्ट जगत का वर्णन करता है। श्री अर्थात मंगल और समृद्धि की देवी के प्राकट्य की यह सबसे प्रसिद्ध कथाओं में से एक है।

विष्णु का वरण

देवताओं ने लक्ष्मी का सम्मान किया। उन्होंने अपने लिए योग्य आश्रय देखकर विष्णु को वरमाला पहनाई। इस प्रसंग में समृद्धि संसार का पालन करने वाले के साथ जुड़ती है; धन को अकेली उपलब्धि के रूप में नहीं रखा जाता।
भागवत में लक्ष्मी के स्वागत में अभिषेक और उपहारों का दृश्य आता है। पवित्र जल, वस्त्र और आभूषण अर्पित किए जाते हैं। फिर भी जीवनसाथी का चुनाव उनका अपना है। वे किसी एक प्रभावशाली गुण पर निर्णय नहीं करतीं। केवल शक्ति, ज्ञान या तपस्या पर्याप्त नहीं होती। वे विष्णु के गले में माला डालती हैं, जिनकी स्थिरता संपदा प्राप्त करने पर निर्भर नहीं है। श्री ऐसे आश्रय को चुनती हैं जहाँ समृद्धि रहे, पर समृद्धि की लालसा शासन न करे।
उनकी दृष्टि संसार में फिर लौटते कल्याण का रूप बनती है। समुद्र-मंथन में सारे रत्न एक साथ नहीं निकलते और शुभ आगमन से पहले संकट भी आया है। इसलिए लक्ष्मी का प्राकट्य श्रम, संघर्ष और संरक्षण के बाद होता है। समृद्धि का भी एक आधार है—जीवन और व्यवस्था सुरक्षित हों, तभी उसका सुख संभव होता है।
अन्य पौराणिक वर्णन लक्ष्मी को भृगु और ख्याति से जोड़ते हैं। ये वंशकथाएँ और समुद्र मंथन का प्राकट्य अलग वर्णन हैं। इन्हें एक साधारण बचपन की लगातार घटनाओं की तरह नहीं जोड़ना चाहिए।

पालनकर्ता के साथ श्री

वैष्णव परंपरा लक्ष्मी और विष्णु को अभिन्न सान्निध्य में स्मरण करती है। विष्णु के संरक्षण-कार्य में उनका साथ है। राम के साथ सीता और कृष्ण के साथ रुक्मिणी को भी इसी व्यापक भाव में उनके स्वरूपों के रूप में सम्मान दिया जाता है। अलग संप्रदाय इस संबंध को अपनी दार्शनिक भाषा में समझाते हैं।
सीता का वनवास और रुक्मिणी का कृष्ण को भेजा संदेश बताते हैं कि यह संगिनी होना केवल शोभा बढ़ाना नहीं है। सीता राम के साथ वन जाने का निर्णय स्वयं कहती हैं। रुक्मिणी अपने चुने हुए पति को पाने के लिए संदेश भेजती हैं। जिन परंपराओं में उन्हें लक्ष्मी के रूप में पूजा जाता है, वहाँ देवी संकल्प और भावना के साथ भगवान की पृथ्वी पर घटित कथा में भाग लेती हैं। मंदिर में शांत बैठी प्रतिमा के पीछे भी यह सक्रिय उपस्थिति है।
कमल उनके स्वरूप का प्रमुख चिह्न है। श्रीसूक्त में समृद्धि के साथ पोषण, अन्न और घर के मंगल की कामना जुड़ी है। इसलिए उनकी उपासना केवल धन तक सीमित नहीं, जीवन को फलने-फूलने देने वाली संपन्नता का स्मरण है।
श्रीसूक्त में देवी के साथ उर्वर जीवन, गौधन, पोषण और प्रकाश की छवियाँ जुड़ती हैं। समुद्र-मंथन की कथा के साथ इन प्रार्थनाओं को पढ़ने पर उनके वरदान का अर्थ व्यापक होता है। घर की समृद्धि में वह भी आता है जिससे दूसरे पलें और जिसे बाँटा जा सके। उनके हाथ का कमल जल पर रहकर प्रकाश की ओर खिलता है। भक्तिपरक अर्थ में वह ऐसी सुंदरता का संकेत है जो समृद्ध होकर भी अपना संतुलन रखती है। दीपक और कृतज्ञ मन से परिवार इसी श्री का स्वागत करता है।
घर के दीपक, अन्न और भोजन बाँटने के भाव में लक्ष्मी की भक्ति आगे बढ़ती है। दीपावली की पूजा इसका एक रूप है। उनकी कथा किसी मानवीय मृत्यु पर नहीं रुकती; भक्त कृतज्ञता के साथ उनके स्थायी सान्निध्य की कामना करते हैं।

सनातन धर्म का प्रकाश आगे बढ़ाएं

एक साझा किया हुआ पाठ किसी और घर में भक्ति की शुरुआत बन सकता है।