नंदी महाराज: शिलाद के पुत्र और शिव के प्रिय सेवक

नंदी महाराज: शिलाद के पुत्र और शिव के प्रिय सेवक

लिंग पुराण में ऋषि शिलाद ऐसे पुत्र की इच्छा करते हैं जिसे सामान्य मृत्यु का बंधन न हो। वे शिव की तपस्या करते हैं। शिव नंदिन नाम से उनके पुत्र रूप में आने का वर देते हैं। बालक के प्राकट्य से शिलाद का जीवन आनंद से भर जाता है।

पिता की चिंता और पुत्र की भक्ति

शिलाद प्रेमपूर्वक नंदी का पालन-पोषण और शिक्षा करते हैं। बाद में बालक की अल्पायु की भविष्यवाणी से परिवार शोक में डूब जाता है। नंदी उसी शिव की शरण लेते हैं जिनकी कृपा से उनका प्राकट्य हुआ था। वे रुद्र मंत्र का जप और शिव का ध्यान करते हैं।
लिंगपुराण में शिलाद द्वारा पुत्र को वेद और अन्य विद्याएँ सिखाने का वर्णन उनके स्नेह को विस्तार देता है। मित्र और वरुण के आने तथा अल्पायु की बात कहने पर आश्रम का वातावरण बदल गया। विद्या और माता-पिता जैसा संरक्षण भी उस आशंका को दूर नहीं कर पा रहा था। परिजन और आश्रमवासी प्रार्थना में लगे। नंदी ने भी अपने बड़ों को प्रणाम किया और फिर स्वयं रुद्र का स्मरण आरंभ किया।
उमा सहित शिव प्रकट होकर उन्हें आश्वस्त करते हैं। कथा प्रिय पुत्र को खोने के भय से आगे बढ़कर ऐसे संबंध तक पहुँचती है जो सामान्य मृत्यु से सीमित नहीं है। नंदी को दिव्य कृपा और शिव का निकट सान्निध्य मिलता है।
शिव का प्रकट होना परिवार पर छाए भय का उत्तर बनता है। वे बताते हैं कि आगंतुक उन्हीं के कहने पर आए थे और नंदी की लौकिक अवस्था तथा उन्हें मिलने वाले दिव्य सामीप्य का अंतर समझाते हैं। इस आश्वासन में उमा भी साथ हैं। नंदी को भगवान के निकट रहने का स्थान मिलता है और पिता की व्याकुल प्रार्थना आयु की आशंका से परे संबंध में पूरी होती है। नंदी परिवार से उदासीन होकर भय नहीं जीतते; उनके आशीर्वाद में परिजनों का स्नेह भी बना रहता है।

शिवगणों के अधिपति

अगले प्रसंग में नंदी का शिवगणों के प्रमुख के रूप में अभिषेक और सुयशा से विवाह वर्णित है। शैव कथा में उनका अपना व्यक्तित्व और स्थान है; वे केवल शिव के पास बैठा अनाम पशु नहीं हैं।
अभिषेक से कथा का विस्तार बदल जाता है। शिलाद के आश्रम का बालक अब शिवगणों के बीच स्वागत पाता है और नेतृत्व का दायित्व ग्रहण करता है। सुयशा से विवाह के प्रसंग में पहले के शोक का स्थान उत्सव लेता है। एकांत में की गई भक्ति को दिव्य समुदाय के बीच सम्मान मिलता है। नंदीश्वर का अधिकार शिव से उसी निकटता से जुड़ा है; गणों में उनका स्थान उन्हें अपना स्वतंत्र परिचय देता है।
मंदिर के सामने बैठा वृषभ एक शांत क्षण को स्थिर करता है। लोग आते, प्रार्थना करते और लौटते हैं, पर नंदी की दृष्टि गर्भगृह की ओर रहती है। भक्त इस एकाग्रता में अपनी पूजा के लिए आदर्श देखते हैं। प्रतिमा के पीछे की कथा जानने पर नंदी के दर्शन शिलाद की अभिलाषा, पुत्र की प्रार्थना और मिले हुए दिव्य साथ का स्मरण बन जाते हैं।
मंदिरों में नंदी शिवलिंग की ओर मुख किए बैठे वृषभ रूप में सबसे अधिक परिचित हैं। उनकी स्थिर दृष्टि को एकाग्र भक्ति का रूप माना जाता है। मंदिर का यह स्वरूप और पौराणिक नंदीश्वर की कथा परस्पर जुड़े हैं, लेकिन हर विवरण को सामान्य मानव जीवन की तरह जोड़ना उचित नहीं।
नंदी की कथा का फल शिव का निरंतर सान्निध्य है। शिलाद की प्रार्थना, नंदी की श्रद्धा और शिव की कृपा मंदिर में शांत बैठे उनके रूप को गहरा अर्थ देती है।

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