प्रह्लाद की विष्णु-भक्ति से उनके पिता हिरण्यकशिपु क्रोधित होते हैं। वे पूछते हैं कि क्या प्रह्लाद के भगवान सभा के खम्भे में भी हैं। खम्भे पर प्रहार करते ही भगवान नरसिंह प्रकट होते हैं—उनका रूप न पूरा मनुष्य है, न पूरा सिंह।
प्रह्लाद की रक्षा
प्रह्लाद की विष्णु-भक्ति से उनके पिता हिरण्यकशिपु क्रोधित होते हैं। वे पूछते हैं कि क्या प्रह्लाद के भगवान सभा के खम्भे में भी हैं। खम्भे पर प्रहार करते ही भगवान नरसिंह प्रकट होते हैं—उनका रूप न पूरा मनुष्य है, न पूरा सिंह।
सन्ध्या के समय नरसिंह हिरण्यकशिपु को सभा के द्वार पर पकड़कर अपनी जाँघों पर रखते हैं और नखों से उसका वध करते हैं। भक्त इस प्रसंग में प्रह्लाद की अटूट निष्ठा और भगवान की रक्षा को स्मरण करते हैं।

