नरसिंह देव

नरसिंह देव

नरसिंह देव भगवान विष्णु के उग्र और रक्षक अवतार हैं, जिन्होंने भक्त प्रह्लाद की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए प्रकट होकर अधर्म का नाश किया।

नरसिंह मूल मंत्र

ॐ नमो नरसिंहाय

दिन

गुरुवार

रंग

पीला

भोग

पंचामृत

पर्व

नरसिंह जयंती

वैकुंठ एकादशी

संक्षिप्त तथ्य

मुख्य भाव

रक्षा, निर्भयता, भक्ति और धर्म की विजय

पवित्र संबंध

प्रह्लाद, स्तंभ और हिरण्यकशिपु का वध

नरसिंह देव की कथा और आध्यात्मिक महत्व

अर्थ, उपासना और उपलब्ध पाठ को समझने के लिए संक्षिप्त परिचय।

नरसिंह देव भगवान विष्णु के उग्र और रक्षक अवतार हैं, जिन्होंने भक्त प्रह्लाद की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए प्रकट होकर अधर्म का नाश किया।

भगवान नरसिंह की कथा

भगवान नरसिंह हिंदू धर्म में भगवान विष्णु के चतुर्थ अवतार के रूप में पूजित हैं। वे अर्ध-नर और अर्ध-सिंह के दिव्य स्वरूप में प्रकट हुए — ऊपर से सिंह का मुख और नीचे से मनुष्य का शरीर। भगवान नरसिंह का यह विलक्षण रूप यह सिद्ध करता है कि ईश्वर अपने भक्तों की रक्षा के लिए किसी भी रूप में, किसी भी समय और किसी भी स्थान पर प्रकट हो सकते हैं। वे भक्त रक्षक, दुष्ट विनाशक और धर्म के पुनर्स्थापक हैं।
भगवान नरसिंह की कथा भक्त प्रह्लाद की अनन्य भक्ति और हिरण्यकशिपु के अहंकार के विनाश की कथा है। यह कथा श्रीमद्भागवत पुराण, विष्णु पुराण और नारद पुराण में विस्तार से वर्णित है। यह कथा यह संदेश देती है कि ईश्वर की भक्ति सदैव विजयी होती है और अधर्म का अंत अवश्यंभावी है।
हिरण्यकशिपु एक अत्यंत शक्तिशाली असुर राजा था जिसने ब्रह्माजी की घोर तपस्या करके अजेय वरदान प्राप्त किया था। उसने वरदान माँगा कि उसे न कोई मनुष्य मारे, न पशु; न दिन में मृत्यु हो, न रात में; न घर के अंदर, न बाहर; न आकाश में, न पृथ्वी पर; न किसी अस्त्र से, न किसी शस्त्र से। इस वरदान के अहंकार में चूर होकर उसने स्वयं को ईश्वर घोषित कर दिया और तीनों लोकों पर अत्याचार करने लगा।
हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद जन्म से ही परम विष्णुभक्त था। माँ के गर्भ में ही उसने नारद मुनि के मुख से भगवान विष्णु की महिमा सुनी थी। हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र को विष्णु भक्ति छोड़ने के लिए अनेक बार समझाया, भयभीत किया और यातनाएँ दीं — किंतु प्रह्लाद की भक्ति अडिग रही। प्रह्लाद के मुख से सदा 'नारायण-नारायण' की ही ध्वनि निकलती थी।

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