श्रीराम का जन्म अयोध्या में राजा दशरथ और रानी कौशल्या के यहाँ हुआ। भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न उनके भाई थे। रामायण में एक राजकुमार की शिक्षा से लेकर परिवार, राज्य और धर्म से जुड़े कठिन निर्णयों तक उनकी यात्रा मिलती है।
विश्वामित्र के साथ और मिथिला में विवाह
युवा राम अपने भाई लक्ष्मण के साथ ऋषि विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा करने गए। मिथिला में उन्होंने शिव के महान धनुष को उठाकर उसकी प्रत्यंचा चढ़ानी चाही, जिससे धनुष टूट गया। राजा जनक की पुत्री सीता से उनका विवाह हुआ और वे अयोध्या लौटे।
विश्वामित्र का आगमन राम को पहली बार राजमहल के सुरक्षित जीवन से बाहर एक बड़े दायित्व की ओर ले गया। दशरथ अपने युवा पुत्र को भेजने में संकोच कर रहे थे, पर ऋषि का आग्रह सीखने और सेवा करने का अवसर बना। लक्ष्मण के साथ राम वन के आश्रमों में गए और वहाँ के अनुष्ठानों में बाधा डालने वाली शक्तियों का सामना किया। इसी यात्रा के आगे मिथिला पहुँचना हुआ। जनक का धनुष केवल राजसभा में कौशल दिखाने की वस्तु नहीं था। उसके टूटने पर दोनों राजवंशों का संबंध जुड़ा और उसी अवसर पर भाइयों के विवाह भी संपन्न हुए।
चौदह वर्ष का वनवास
राज्याभिषेक से पहले कैकेयी ने दशरथ से दो वर माँगे—भरत को राज्य और राम को चौदह वर्ष का वनवास। राम के साथ सीता और लक्ष्मण भी वन गए। भरत ने राज्य को अपना अधिकार नहीं माना और राम की खड़ाऊँ को सिंहासन पर रखकर उनकी ओर से शासन सँभाला।
वनवास की व्यवस्था होते समय भरत अयोध्या में नहीं थे। लौटने पर उन्होंने अपने नाम पर प्राप्त राज्य को स्वीकार नहीं किया और राम को वापस लाने वन गए। दोनों भाइयों की भेंट में कर्तव्य के दो भाव सामने आए। भरत अन्याय को सुधारना चाहते थे, जबकि राम पिता के वचन को छोड़ना नहीं चाहते थे। पादुकाएँ लेकर लौटने पर भरत राज्य के स्वामी की तरह नहीं, राम के प्रतिनिधि की तरह रहे। निर्धारित अवधि तक प्रतीक्षा करना भी उनकी सेवा का रूप बन गया।
वनवास में रावण ने सीता का हरण कर लिया। उनकी खोज में राम का मिलन हनुमान और सुग्रीव से हुआ। हनुमान द्वारा लंका में सीता का पता लगाने के बाद समुद्र पर सेतु बनाया गया। युद्ध में राम ने रावण का वध किया और सीता से पुनर्मिलन हुआ। वाल्मीकि रामायण में अग्निपरीक्षा तथा अग्नि देव द्वारा सीता की पवित्रता की पुष्टि का प्रसंग भी है; बाद की रामकथाओं में इसकी व्याख्याएँ अलग हैं।
सीता की खोज में राम को वियोग के साथ अप्रत्याशित सहायता भी मिली। रावण को रोकने का प्रयास करने वाले जटायु ने प्राण छोड़ने से पहले समाचार दिया। शबरी ने अपने आश्रम में दोनों भाइयों का स्वागत किया और आगे का मार्ग बताया। किष्किंधा में सुग्रीव की मित्रता से खोज कई दिशाओं तक पहुँची। दक्षिण की ओर गई टोली को सीता के लंका में होने का पता चला। तब हनुमान ने समुद्र पार किया और आशा जगाने वाला संदेश लेकर लौटे।
युद्ध से पहले विभीषण रावण को छोड़कर राम की शरण में आए। कुछ साथियों की आशंकाओं के बावजूद राम ने उन्हें स्वीकार किया। यह प्रसंग शरणागत के संरक्षण के आश्वासन के रूप में याद किया जाता है। युद्ध में सेतु बनाने वालों, दूतों, वानर योद्धाओं और लक्ष्मण सहित अनेक लोगों ने अपना दायित्व निभाया। राम की विजय में रावण से उनका सामना जितना महत्वपूर्ण है, उतनी ही यह सामूहिक सेवा भी है।
अयोध्या वापसी और आगे की कथा
वनवास पूरा होने पर राम अयोध्या लौटे और उनका राज्याभिषेक हुआ। उत्तरकांड में सीता का वाल्मीकि आश्रम में रहना, लव-कुश का जन्म, सीता का पृथ्वी में समाना और अंततः राम का सरयू के माध्यम से प्रस्थान वर्णित है। अनेक भक्तिपरक रामकथाएँ राज्याभिषेक पर ही पूर्ण होती हैं।
बाद के इन मार्मिक प्रसंगों को विभिन्न परंपराएँ अलग दृष्टि से समझती हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम राम की कथा में स्नेह, राजधर्म और व्यक्तिगत पीड़ा के बीच कर्तव्य का प्रश्न बार-बार सामने आता है।

