साईं बाबा के प्रारंभिक जीवन का निश्चित विवरण उपलब्ध नहीं है। उनके माता-पिता, जन्मस्थान और जन्मतिथि के बारे में मतभेद हैं। साईं सच्चरित्र में शिरडी आए एक युवा साधक का वर्णन मिलता है, जो नीम के वृक्ष के पास रहते थे और बाद में लौटकर शिरडी में बस गए।
शिरडी में निवास
उनकी वापसी का प्रसंग चाँद पाटिल के विवाह-दल से जुड़ा है। खंडोबा मंदिर के पास म्हालसापति ने उन्हें ‘साईं’ कहकर संबोधित किया। आगे वे उस मस्जिद में रहने लगे जिसे द्वारकामाई के नाम से याद किया जाता है। वहाँ प्रज्वलित धूनी उनके दैनिक जीवन का अंग बनी।
सच्चरित्र में चाँद पाटिल की खोई हुई घोड़ी की खोज के समय युवा फकीर से भेंट का वर्णन है। उस परिचय के बाद विवाह-समूह के साथ शिर्डी आने का प्रसंग जुड़ता है। बाबा किसी संपन्न धार्मिक नेता की तरह वहाँ नहीं आए थे। वे सादगी से रहते, कफनी पहनते और रोजमर्रा की मुलाकातों से गाँव के लोगों के परिचित बने। मस्जिद, गाँव के रास्ते और भिक्षा देने वाले घर उनके जीवन का परिवेश बने।
बाबा भिक्षा माँगते और प्राप्त भोजन बाँटते थे। हिंदू और मुस्लिम, दोनों समुदायों के लोग उनके पास आते थे। वे अक्सर किसी सरल घटना, छोटी कथा या सेवा के कार्य के माध्यम से सीख देते थे।
श्रद्धा, सबुरी और करुणा
साईं परंपरा में श्रद्धा और सबुरी—विश्वास और धैर्य—का विशेष स्थान है। सच्चरित्र में भक्तों द्वारा अनुभव की गई सहायता, अंतर्दृष्टि और चमत्कारों के अनेक वर्णन हैं। इन्हें भक्तों की आस्था के अनुभवों के रूप में पढ़ा जाता है। धूनी की उदी बाँटने की स्मृति आज भी उनकी भक्ति का महत्वपूर्ण अंग है।
दीपक और व्यवहार की सीख
पाँचवें अध्याय में दुकानदारों द्वारा दीपकों के लिए तेल न देने का प्रसंग आता है। श्रद्धापरक वर्णन के अनुसार बाबा ने पानी का उपयोग किया और दीपक फिर भी जल उठे। अपनी भूल समझने पर दुकानदारों को सत्य और सद्व्यवहार की सीख मिली। इस घटना को केवल चमत्कार के रूप में नहीं, पड़ोसियों के साथ व्यवहार बदलने वाले प्रसंग के रूप में भी याद किया जाता है।
भूखों को भोजन देना और मनुष्यों तथा पशुओं के प्रति दया रखना उनके जीवन में प्रमुख था। प्रार्थना के साथ किसी की आवश्यकता को समझना और उसकी सहायता करना भी सेवा का हिस्सा था।
एक आत्मीय प्रसंग में श्रीमती तर्खड़ अपने भोजन से पहले भूखे कुत्ते को रोटी देती हैं। बाद में बाबा कहते हैं कि उनके इस व्यवहार से वे तृप्त हुए। श्रीमती तर्खड़ के आश्चर्य करने पर बाबा उस जीव को दिए गए भोजन को अपनी सेवा से जोड़ते हैं। कथा सुनने वाले के सामने प्रश्न आता है कि सहायता माँगने वाले का रूप देखने से पहले उसकी भूख को पहचाना जाए। रोटी का छोटा-सा टुकड़ा प्राणियों में ईश्वर की उपस्थिति की सीख बन जाता है।
तर्खड़ परिवार के एक अन्य प्रसंग में घर पर भोग देना भूल जाने और शिर्डी में बाबा के भूखे लौटने की बात कहने का वर्णन है। परिवार के पत्रों का आदान-प्रदान उनकी अंतर्दृष्टि के श्रद्धापरक प्रमाण के रूप में आता है। इसके साथ एक परिचित बात भी जुड़ती है—दैनिक पूजा में ध्यान और प्रेम न रहे तो वह केवल आदत बन सकती है। ऐसे घरेलू प्रसंग समझाते हैं कि बाबा की स्मृति अनुयायियों के रोजमर्रा के जीवन से इतनी निकट क्यों जुड़ी।
15 अक्टूबर 1918 को विजयादशमी के दिन शिरडी में उनका देहावसान हुआ। भक्त इसे महासमाधि कहते हैं। उनका समाधिस्थल आगे समाधि मंदिर बना। शिरडी में बिताया उनका जीवन सेवा और आत्मीयता के रूप में याद किया जाता है।

