श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड की परंपरा वैष्णवी नाम की दिव्य कन्या की कथा बताती है, जिनकी साधना उन्हें त्रिकूट पर्वत तक लाई। उनके प्राकट्य को महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की शक्तियों से जोड़ा जाता है। यह तीर्थ की पवित्र कथा है, निश्चित ऐतिहासिक तिथियों वाला मानव जीवनवृत्त नहीं।
श्रीराम से मिलन
वैष्णवी ने साधना की और श्रीराम से उनका मिलन हुआ। मंदिर की कथा के अनुसार राम ने उन्हें उत्तर के पर्वतों में जाकर साधना जारी रखने और भक्तों को अनुग्रह देने का मार्ग बताया। उन्होंने त्रिकूट को अपना निवास बनाया।
देवस्थान की परंपरा में वैष्णवी कम आयु से ही आध्यात्मिक उद्देश्य की खोज करती हैं। राम से उनकी भेंट उसी खोज का भाग है और त्रिकूट की ओर जाने का निर्देश उसे स्थायी स्थान देता है। पर्वत साधना और आने वालों के कल्याण का निवास बनते हैं। कथा का यह भाग समझाता है कि यात्रा केवल किसी युद्धस्थल तक पहुँचना नहीं, माता के चुने हुए धाम की ओर जाना है।
श्रीधर का भंडारा और भैरोंनाथ का पीछा
भक्त श्रीधर ने माता की कृपा से जुड़ा भंडारा आयोजित किया। भैरोंनाथ वैष्णवी के संकल्प का सम्मान न करते हुए उनका पीछा करने लगा। यात्रा-पथ पर अर्धकुवारी और उनकी साधना की गुफा जैसे स्थान इसी यात्रा की स्मृति रखते हैं।
श्रीधर का प्रसंग दिव्य घटनाओं के साथ एक साधारण भक्त को स्थान देता है। उनसे जुड़ा भंडारा उनके साधनों से कहीं बड़ा प्रतीत होता है, पर माता की कृपा से उसका आयोजन संभव होता है। बाद में माता के दिखाई न देने पर भी उनकी खोज समाप्त नहीं होती। श्राइन बोर्ड के गुफा की खोज वाले विवरण में स्वप्न में मार्गदर्शन मिलने और पर्वतों में ढूँढ़ते हुए गुफा तक पहुँचने का वर्णन है। श्रीधर की भक्ति उस गुप्त निवास को लोगों के दर्शन योग्य तीर्थ से जोड़ती है।
पवित्र गुफा पर माता ने दिव्य रूप धारण करके भैरोंनाथ का सिर काट दिया। परंपरा के अनुसार उसे अपनी भूल का बोध हुआ और उसने क्षमा माँगी। माता ने उसे यात्रा में स्थान दिया। इसी कारण भैरों मंदिर के दर्शन वैष्णो देवी की यात्रा से जुड़े हैं।
संबद्ध भैरों मंदिर इस प्रसंग का दूसरा भाग सँजोता है—भूल की पहचान और पश्चात्ताप पर माता की प्रतिक्रिया। इससे पीछा करने की गंभीरता कम नहीं हो जाती। यात्री स्मरण करता है कि देवी ने आक्रमण रोका और उसके बाद बदले हुए संबंध के लिए स्थान दिया। उस मंदिर की ओर बढ़ना कथा के अंत को गुफा से आगे तक ले जाता है।
तीन पवित्र पिंडियाँ
गर्भगृह में माता की उपस्थिति तीन प्राकृतिक पिंडियों के रूप में पूजित है। इन्हें महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के स्वरूप माना जाता है। कथा इसी स्थायी प्राकट्य तक पहुँचती है।
पवित्र गुफा में तीन अलग मानवाकार मूर्तियों के स्थान पर प्राकृतिक शिला-पिंडियों के दर्शन होते हैं। उन्हें एक साथ पूजते हुए महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की शक्तियों को एक पवित्र उपस्थिति में स्मरण किया जाता है। पर्वतों का लंबा मार्ग अंत में दर्शन के इस केंद्र तक लाता है। भक्त के लिए वैष्णवी की साधना, श्रीधर की खोज और माता का संरक्षण इसी आगमन के क्षण में एक साथ उपस्थित होते हैं।
पर्वत का मार्ग वैष्णवी की साधना और माता की रक्षा, दोनों का स्मरण कराता है। तीर्थ का भूगोल कथा को जीवित रखता है। इसका समापन मृत्यु पर नहीं, गुफा में माने जाने वाले माता के निरंतर सान्निध्य के दर्शन पर होता है।

