॥ दोहा ॥
वायु देव की जय करूँ, पवन पुत्र हनुमान।
जगत के प्राण तुम्हीं हो, करो कृपा भगवान॥
जल थल नभ में व्याप्त हो, तुम हो प्राण स्वरूप।
चरण शरण में आया हूँ, दर्शन दो भरपूर॥
॥ चौपाई ॥
जय वायु देव जय पवन राया।जग के प्राण तुम्ही हो, महाराया॥
जल थल नभ में तुम विचरत हो।सकल सृष्टि के प्राण भरत हो॥
वेद पुराणों में महिमा तेरी।सुरासुर सब करते जय जैकारी॥
पंचतत्त्व में एक हो तुम ही।सृष्टि के आधार हो तुम ही॥
शीतल मंद सुगंध बहाते।जन-जन के संताप मिटाते॥
तुमसे ही जीवन है जग में।तुम बिन सूना घर और नगर में॥
देव दानव और मानव सारे।सब तुम्हारे ही आश्रित प्यारे॥
अग्नि तत्त्व को बल तुम देते।जल को गति और दिशा तुम देते॥
ऋग्वेद में तुम्हारा गुणगान।ऋषि-मुनि करते तुम्हारा ध्यान॥
मरुत गण तुम्हारे पुत्र कहाते।इंद्र के संग संग्राम लड़ाते॥
हनुमान तुम्हारे पुत्र महाबली।रामकाज करने उठे उड़ चली॥
लंका दहन किया तुम्हारे सुत ने।पाप रावण का नाश किया जड़ से॥
भीम को बल तुमने ही दिया था।महाभारत में यश तुमने लिया था॥
प्राणायाम से करें जो पूजा।वायु देव का न हो कोई दूजा॥
उत्तर दिशा के तुम हो स्वामी।नैऋत्य कोण के अंतर्यामी॥
प्रात:काल जो तुमको ध्याये।सुख संपत्ति घर में वह पाये॥
वायु पुराण में कथा तुम्हारी।ब्रह्मा विष्णु महेश से प्यारी॥
शिव जी के श्वास स्वरूप कहाते।ब्रह्माण्ड में प्राण तुम बन जाते॥
वर्षा ऋतु में मेघ उड़ाते।धरती को जल अमृत पिलाते॥
सुख की बेला में मंद बहो तुम।दुख की घड़ी में साथ रहो तुम॥
जो कोई तुमको शीश नवाये।रोग शोक दुख उससे जाये॥
पवन देव की शरण जो आये।जन्म-मरण के फेर से बच जाये॥
तन मन प्राण तुम्हारे चरणों में।रहूँ सदा तेरी ही शरणों में॥
बाल बुद्धि और धन की दाता।तुम ही हो जग के सुख विधाता॥
जो चालीसा पाठ करे नित।होय प्रसन्न वायु देव हरदम चित॥
॥ दोहा ॥
वायु देव चालीसा पाठ, करे जो नित्य नियाय।
रोग दोष सब दूर हों, मिले मोक्ष का साय॥
पवन देव की कृपा से, जीवन हो सुखमय।
भक्त सदा सुखी रहें, होवे न कोई भय॥

