विंध्यवासिनी का अर्थ है विंध्य पर्वत में निवास करने वाली देवी। उनका संबंध योगमाया और जगत की रक्षा के लिए देवी के आश्वासन से जुड़ा है। विंध्याचल की तीर्थपरंपरा में यही पर्वतीय निवास उनकी आराधना का केंद्र बनता है।
कंस के हाथों से छूटने वाली कन्या
भागवत पुराण की कृष्णकथा में वसुदेव कृष्ण को यशोदा के घर पहुँचाकर उनकी नवजात कन्या को मथुरा ले आते हैं। कंस कन्या को मारना चाहता है, पर वह उसके हाथ से छूटकर आकाश में दिव्य रूप में प्रकट होती है। वह बताती है कि कंस का अंत करने वाला कहीं और जन्म ले चुका है।
कंस अपने अंत की आशंका से बहन की संतानों का वध करा चुका था। नवजात कन्या ऐसे कारागार में आती है जहाँ पहले से वियोग छाया है। देवकी उसे छोड़ देने की विनती करती हैं, पर कंस नहीं मानता। कन्या उसके हाथों से छूटकर दिव्य रूप में प्रकट होती है, तो भविष्य को बल से अपने अधिकार में रखने का उसका प्रयास विफल हो जाता है। देवी की चेतावनी बताती है कि असहाय पर हिंसा करके वह अपने भय का समाधान नहीं कर सकता।
ग्रंथ आगे देवी के अलग स्थानों पर अलग नामों से प्रसिद्ध होने का उल्लेख करता है। इस योगमाया की विंध्यवासिनी से पहचान व्यापक भक्ति परंपरा का हिस्सा है। इसलिए कंस से छूटने और विंध्य में निवास की कथाओं का संबंध स्पष्ट रखते हुए वर्णन करना चाहिए।
देवीमाहात्म्य का आश्वासन
देवीमाहात्म्य के ग्यारहवें अध्याय में देवी नंद के घर यशोदा से जन्म लेकर विंध्य में रहने और शुंभ-निशुंभ का विनाश करने के भावी प्राकट्य की बात कहती हैं। यह उसी ग्रंथ की कथा में दिया गया आश्वासन है।
देवीमाहात्म्य में यह आश्वासन देवताओं द्वारा देवी की स्तुति के बाद आता है। एक विजय मिल जाने से संसार के सारे संकट सदा के लिए समाप्त नहीं माने जाते। ग्रंथ आगे भी देवी के प्राकट्य की बात करता है। विंध्य में निवास उसी पुनः संरक्षण के वचन का भाग है। इसलिए पर्वत केवल कथा की पृष्ठभूमि नहीं; वह माता की स्मरणीय और सुलभ उपस्थिति का आश्रय बन जाता है।
भागवत का कारागार-प्रसंग और देवीमाहात्म्य का वचन उपासना में जुड़े हैं, फिर भी दोनों का अपना संदर्भ है। एक में कृष्णजन्म की कथा के साथ कन्या तत्काल संकट से छूटती है; दूसरे में देवी भविष्य के एक चक्र की बात करती हैं। यह भक्तिपरक संबंध विंध्यवासिनी नाम को विस्तार देता है, बिना दोनों को एक ही तिथि-क्रम में बाँधे।
विंध्याचल की यात्रा में विंध्यवासिनी मंदिर के साथ काली खोह और अष्टभुजा भी जुड़े हैं। स्थानीय परंपराएँ इन स्थानों के बारे में अतिरिक्त कथाएँ सुनाती हैं।
विंध्यवासिनी, काली खोह और अष्टभुजा के बीच जाते हुए यात्री इन संबंधों को स्मरण करते हैं। तीनों देवस्थान माता के भिन्न रूपों को एक साझा तीर्थक्षेत्र में स्थान देते हैं। मुख्य मंदिर के साथ आसपास के पर्वत भी यात्रा का अंग बनते हैं। कथा केवल सुनाई नहीं जाती; मार्ग पर चलकर भी याद की जाती है। स्तुति में प्रयुक्त विंध्येश्वरी नाम इसी क्षेत्र में उनकी अधिष्ठात्री सत्ता का सम्मान करता है। इस स्मृति के केंद्र में दर्शन के लिए आने वालों के बीच माता का निवास है।
देवी की कथा पर्वतों में उनके निरंतर सान्निध्य तक पहुँचती है। कंस जिसे वश में नहीं कर सका, वही माता भक्तों की रक्षक मानी जाती हैं। उनका नाम उनके स्थायी निवास की स्मृति बनाए रखता है।

