अग्नि देव: यज्ञ की ज्वाला में देवदूत

अग्नि देव: यज्ञ की ज्वाला में देवदूत

ऋग्वेद का आरंभ अग्नि के आह्वान से होता है। अग्नि देव यज्ञ की पवित्र ज्वाला, पुरोहित स्वरूप और देवताओं तक आहुति पहुँचाने वाले दूत हैं। उनके माध्यम से गृहस्थ जीवन और दिव्य जगत का संबंध व्यक्त होता है।

बार-बार प्रज्वलित होने वाला स्वरूप

वैदिक सूक्त अग्नि के अनेक जन्मों और स्थानों का वर्णन करते हैं—काष्ठ से प्रकट ज्वाला, आकाश का प्रकाश और जगत में छिपा तेज। ये उनके विविध स्वरूपों की पवित्र अभिव्यक्तियाँ हैं, किसी एक सामान्य बाल्यकाल के अलग-अलग विवरण नहीं।
ऋग्वेद का पहला सूक्त अग्नि से देवताओं को निकट लाने और यज्ञ का मार्गदर्शन करने की प्रार्थना करता है। अग्नि आहुति ग्रहण करके उसे रूपांतरित करते हैं। इसलिए अग्नि को सँभालना ध्यान, सावधानी और निरंतरता से जुड़ा कर्म बना।
वेदों के सूक्त अग्नि को केवल उपयोगी वस्तु की तरह संबोधित नहीं करते। वे अतिथि, मार्गदर्शक और अर्पित सामग्री को पहुँचाने वाले हैं। अग्नि सँभालने वाला गृहस्थ अपने दैनिक कार्य में पवित्र उपस्थिति के लिए स्थान बनाता है। उसे प्रज्वलित करना, आहुति देना और सुरक्षित रखना निरंतर ध्यान माँगता है। अग्नि के सदा युवा कहे जाने का एक भाव यही है—ज्योति हर बार नई प्रकट होती है, जबकि उससे जुड़ा संबंध पीढ़ियों तक जाता है।
जातवेदस नाम जन्मों अथवा प्राणियों के ज्ञान से जुड़ा है। वैदिक स्तुति में प्रकाश वस्तुओं को दिखाने के साथ ज्ञान का भाव भी व्यक्त करता है। अग्नि अर्पण करने वाले मनुष्य और उसे ग्रहण करने वाले देवताओं के बीच हैं। स्थिर दिखाई देने वाली लकड़ी और उससे निकलती ज्योति के बीच भी उनका रूप दिखाई देता है। उनके अनेक वर्णन ऐसे अनुभवों से बनते हैं, किसी एक राजमहल या बाल्ययात्रा से नहीं।

तिनके की परीक्षा

केन उपनिषद में विजय के बाद देवताओं को अपने बल का अभिमान होता है। एक रहस्यमय सत्ता सामने आती है। अग्नि अपने सामर्थ्य से पृथ्वी की वस्तुओं को जलाने की बात कहते हैं, पर सामने रखा तिनका नहीं जला पाते। इस अनुभव से स्पष्ट होता है कि उनका बल ब्रह्म से स्वतंत्र नहीं है।
अग्नि उस रहस्यमय उपस्थिति को न पहचान पाने पर लौटते हैं। फिर वायु जाते हैं, पर वे तिनके को हिला नहीं पाते। इंद्र के पास पहुँचने पर वह उपस्थिति अंतर्धान हो जाती है। उमा उन्हें बताती हैं कि विजय ब्रह्म की थी। इस प्रकार अग्नि की परीक्षा देवताओं द्वारा किए गए एक व्यापक बोध का भाग बनती है। उनकी शक्तियाँ हैं, पर उन्हें पूर्णतः अपनी और स्वतंत्र मान लेना भूल है। एक छोटा-सा तिनका उस निश्चितता को रोक देता है।
रामायण में सीता के अग्नि से बाहर आने और उनकी पवित्रता की पुष्टि के प्रसंग में भी अग्नि देव साक्षी हैं। यहाँ अग्नि का संबंध सत्य और गंभीर प्रमाण से जुड़ता है।
यज्ञ और विवाह संस्कार में अग्नि की उपस्थिति इन्हीं आहुति तथा साक्षी के भावों से संबंधित है। उनका पवित्र स्मरण हर प्रज्वलन के साथ नया होता है; उसकी उपस्थिति पीढ़ियों तक घर के संस्कारों से जुड़ी रहती है। ज्वाला का तेज और उपनिषद का छोटा तिनका सामर्थ्य के साथ विनम्रता की याद दिलाते हैं।

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