भागवत पुराण की सृष्टिकथा में ब्रह्मा जी विष्णु के नाभिकमल पर प्रकट होते हैं। चारों ओर जल है और उनके सामने सबसे पहला प्रश्न है—वे कहाँ से आए हैं और उन्हें क्या करना है? सृष्टि रचना से पहले अपनी उत्पत्ति और दायित्व को समझने की खोज आरंभ होती है।
वे दिशाओं में देखते हैं और कमल की नाल में उतरकर उसका मूल खोजते हैं, पर केवल बाहरी खोज से उत्तर नहीं मिलता। कमल पर लौटकर वे ध्यान करते हैं। नारायण का बोध उनकी सृष्टि रचना का आधार बनता है।
कमल पर आसन मिल जाने से ब्रह्मा को तुरंत अपने अस्तित्व का रहस्य ज्ञात नहीं हो जाता। चारों ओर जल देखकर वे जानना चाहते हैं कि वे कहाँ से आए और उनका आधार क्या है। कमलनाल में नीचे जाने पर भी उत्तर नहीं मिलता। लौटकर एकाग्र होने के बाद उन्हें शेषशायी भगवान का दर्शन होता है। भागवत की इस कथा में सृष्टिकर्ता का पहला कार्य जिज्ञासु बनना है। संसार की रचना का दायित्व अपने को सर्वज्ञ मान लेने से नहीं, ज्ञान ग्रहण करने से आरंभ होता है।
सृष्टिकर्ता का कार्य
ब्रह्मा से ऋषियों और प्रजापतियों का प्राकट्य होता है, जिनके माध्यम से प्रजा का विस्तार होता है। सनकादि कुमार और नारद उनके मानसपुत्रों की कथाओं में आते हैं। कुमार सांसारिक प्रजा बढ़ाने के स्थान पर आत्मज्ञान का मार्ग चुनते हैं। पुराण आगे सृष्टि के अनेक चरणों का वर्णन करते हैं।
सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार उस गृहस्थ भूमिका को स्वीकार नहीं करते जिसकी ब्रह्मा ने उनसे अपेक्षा की थी। वे आत्मचिंतन और ज्ञान का मार्ग चुनते हैं। उनके निर्णय से सृष्टिकथा में नया मोड़ आता है और रुद्र के प्राकट्य का प्रसंग जुड़ता है। ब्रह्मा को प्रकट होने वाली शक्तियों को उचित दिशा भी देनी पड़ती है। आगे ऋषियों तथा मनु और शतरूपा का वर्णन आता है, जिनसे मानव वंश की एक अगली अवस्था बढ़ती है।
इन प्रसंगों में सृष्टि केवल सहज आदेश से पूरी नहीं हो जाती। सृष्टिकर्ता को अपने से भिन्न इच्छाओं और प्रबल शक्तियों का भी सामना होता है। कुमारों का वैराग्य संतान-वृद्धि की तत्काल अपेक्षा पूरी नहीं करता, फिर भी उसका संसार में महत्वपूर्ण स्थान है। इस प्रकार ज्ञान, संयम और जीवन की निरंतरता—तीनों को जगह देने का दायित्व ब्रह्मा की कथा में दिखाई देता है।
उनके चार मुखों को परंपरा में चार वेदों से जोड़ा जाता है। विद्या और वाणी की देवी सरस्वती का उनसे घनिष्ठ संबंध है। सृष्टिकर्ता ब्रह्मा और दर्शन में प्रयुक्त परम सत्य के अर्थ वाला ‘ब्रह्म’ अलग संदर्भ हैं; दोनों शब्दों को एक अर्थ में नहीं लेना चाहिए।
कालचक्र में ब्रह्मा
भगवद्गीता ब्रह्मा के विशाल दिन और रात्रि का वर्णन करती है, जिनमें प्राणियों की अभिव्यक्ति और लय होती है। ब्रह्मा का कार्य सृष्टि के इसी चक्रीय स्वरूप से जुड़ा है। दूसरे ग्रंथों में सृष्टि के अन्य वर्णन भी हैं; नाभिकमल की कथा एक प्रमुख पौराणिक परंपरा है।
गीता में ब्रह्मा का एक दिन चार युगों के एक हजार चक्रों के बराबर और उनकी रात्रि भी उतनी ही लंबी बताई गई है। दिन आरंभ होने पर प्राणी फिर प्रकट होते हैं और रात्रि आने पर अव्यक्त अवस्था में लौटते हैं। यह समयमान मनुष्य के एक जीवन को व्यापक दृष्टि में देखने का अवसर देता है। सृष्टिकर्ता के कार्य में भी प्रकट होने और विश्राम का क्रम है। ब्रह्मा का महत्व बना रहता है, पर जिस परम आधार से उन्हें दायित्व मिलता है, वह किसी एक रचित संसार की अवधि से परे है।
इस कथा में सृजन से पहले जिज्ञासा और ध्यान आते हैं। ब्रह्मा पहले अपने दायित्व को समझते हैं, फिर रचना करते हैं। उनका स्मरण ज्ञान के साथ जुड़ी जिम्मेदारी और अपने सामर्थ्य के मूल को जानने की विनम्रता का भाव जगाता है।

