दुर्गा माता: महिषासुर-वध और माता का आश्वासन

दुर्गा माता: महिषासुर-वध और माता का आश्वासन

देवीमाहात्म्य में राज्य खो चुके राजा सुरथ और अपने परिवार से दुखी व्यापारी समाधि ऋषि मेधा के पास जाते हैं। ऋषि उन्हें देवी की कथाएँ सुनाते हैं। इसी भूमिका में दुर्गा माता के युद्ध उस शक्ति का परिचय देते हैं जो अन्य रक्षकों के पराजित होने पर जगत को सँभालती है।
सुरथ अपना राज्य खो चुके थे, फिर भी वहाँ के लोगों, पशुओं और संपत्ति की चिंता उन्हें छोड़ नहीं रही थी। समाधि को परिवार ने त्याग दिया था, पर मन बार-बार उन्हीं संबंधों की ओर लौटता था। मेधा ऋषि के आश्रम में दोनों ने पूछा कि दुःख देने वालों के प्रति भी मन का लगाव क्यों बना रहता है। ऋषि ने समस्त प्राणियों में कार्य करने वाली महामाया की शक्ति का वर्णन किया। देवी के युद्धों की विशाल कथा इसी आत्मीय प्रश्न के भीतर सुनाई जाती है।

महिषासुर का आतंक और देवी का प्राकट्य

महिषासुर ने देवताओं को पराजित करके उनके स्थान छीन लिए। दिव्य शक्तियों के संयुक्त तेज से देवी प्रकट हुईं और देवताओं ने उन्हें अपने आयुध दिए। सिंह पर आरूढ़ देवी ने असुर सेना का सामना किया और अंततः बार-बार रूप बदलते महिषासुर को परास्त किया।
महिषासुर का बार-बार रूप बदलना इस युद्ध को किसी एक पशुरूप से हुए संघर्ष से अधिक बनाता है। वह भैंसे, सिंह, पुरुष और हाथी के रूप में सामने आता है। प्रत्येक परिवर्तन देवी के नियंत्रण से बच निकलने का प्रयास है। अंत में वे महिष रूप को रोकती हैं और उससे असुर के निकलते समय प्रहार करती हैं। महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा उसी निर्णायक क्षण को सामने रखती है, पर ग्रंथ उससे पहले चले लंबे संघर्ष का अनुभव भी कराता है।
महिषासुरमर्दिनी नाम इसी विजय का स्मरण है। इस कथा में देवी स्वयं निर्णायक रक्षक हैं। उनकी विजय से देवताओं को उनके स्थान फिर मिले।

शुंभ-निशुंभ और शक्ति के अनेक रूप

अगले चरित्र में शुंभ और निशुंभ का संकट आता है। देवी की शक्तियाँ काली और मातृकाओं सहित अनेक रूपों में प्रकट होती हैं। शुंभ जब दूसरे रूपों की सहायता लेने का आरोप लगाता है, देवी उन शक्तियों को अपने भीतर समेटकर उनकी एकता स्पष्ट करती हैं और अंतिम युद्ध करती हैं।
शुंभ की चुनौती देवी के बल के साथ उनकी स्वतंत्रता से भी जुड़ी है। वह और निशुंभ देवताओं की संपदा तथा अधिकार ले चुके हैं और देवी को भी अपनी प्राप्त वस्तुओं में जोड़ना चाहते हैं। देवी इस दावे को स्वीकार नहीं करतीं। उनके विरुद्ध भेजी गई सेनाओं के सामने अनेक शक्तियाँ प्रकट होती हैं। फिर उनका देवी में लौटना इस आरोप का उत्तर देता है कि देवी की शक्ति किसी अन्य की दी हुई सहायता मात्र है। कथा अधिकार जताने की इच्छा से ऐसी दिव्य सत्ता की पहचान तक जाती है जिस पर स्वामित्व नहीं रखा जा सकता।
देवी आगे भी संकट आने पर प्रकट होकर रक्षा करने का आश्वासन देती हैं। मूल कथा के अंत में सुरथ और समाधि उनकी आराधना करके अपनी-अपनी अभिलाषा के अनुसार वर पाते हैं।
सुरथ अपना राज्य वापस पाना चाहते हैं और उन्हें भविष्य में मनु होने का वर भी मिलता है। समाधि ऐसा ज्ञान माँगते हैं जिससे अहंता और ममता का बंधन दूर हो। माता दोनों की प्रार्थना स्वीकार करती हैं। इन भिन्न वरदानों से मेधा ऋषि के पास आए उनके प्रश्न को पूर्णता मिलती है। एक संसार के दायित्व में लौटता है और दूसरा आसक्ति से मुक्ति चाहता है। देवी का अनुग्रह एक ही पुरस्कार तक सीमित नहीं होता जिसे हर भक्त को चाहना पड़े।
दुर्गा की कथा केवल एक युद्ध नहीं है। वह मानवीय दुख से माता की शरण तक और अनेक रूपों से एक शक्ति के बोध तक जाती है। नवरात्रि में पाठ, पूजा और विजय का उत्सव इसी स्मृति को जीवित रखते हैं।

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