गंगा माता के धरती पर आने की कथा पूर्वजों के उद्धार के लिए किए गए लंबे प्रयास से जुड़ी है। राजा सगर के पुत्र कपिल ऋषि का अनादर करने के बाद भस्म हो गए थे। उनके वंशज ऐसी पवित्र धारा लाना चाहते थे जिससे उन्हें मुक्ति मिले।
भगीरथ का अटल प्रयास
पहली पीढ़ियों के प्रयासों के बाद भगीरथ ने तपस्या करके गंगा से पृथ्वी पर आने की प्रार्थना की। गंगा सहमत हुईं, पर पूछा कि उनके अवतरण का प्रचंड वेग कौन सँभालेगा। स्वर्ग से आती धारा बिना उचित आधार के पृथ्वी को क्षति पहुँचा सकती थी।
यह दायित्व कई पीढ़ियों से चला आ रहा था। सगर के वंशज राजशक्ति से उस क्षति को दूर नहीं कर सके और भगीरथ को अधूरा कार्य मिला। उनकी तपस्या दूसरों के लिए किए गए दृढ़ प्रयास के रूप में याद की जाती है। गंगा की सहमति के बाद भी शिव से प्रार्थना आवश्यक होती है। यही क्रम अवतरण को विस्तार देता है। किसी श्रेष्ठ इच्छा के पूरा होने के साथ ऐसी व्यवस्था भी चाहिए जिससे संसार को उससे लाभ मिले, हानि नहीं।
भगीरथ ने शिव की आराधना की। शिव ने गंगा को अपने मस्तक पर धारण किया, जिससे उनका जल सुरक्षित रूप से धरती तक पहुँचा। गंगा भगीरथ के पीछे चलकर उनके पूर्वजों की भस्म तक पहुँचीं और उनका उद्धार हुआ। भागीरथी नाम राजा के इसी प्रयास की स्मृति है।
जाह्नवी और अन्य कथाएँ
रामायण की अवतरण-कथा में ऋषि जह्नु द्वारा जल को ग्रहण करने और फिर छोड़ने का प्रसंग भी है। इससे गंगा का जाह्नवी नाम जुड़ता है। अन्य वर्णन उन्हें हिमवान से जोड़ते हैं या विष्णु के चरणों से उनका पवित्र संबंध बताते हैं। ये उनके दिव्य उद्गम के अलग आयाम हैं।
रामायण में गंगा की धारा जह्नु ऋषि के यज्ञस्थल में पहुँचती है। ऋषि उसे पी लेते हैं और यात्रा रुक जाती है। देवता और ऋषि उनसे निवेदन करते हैं, तब वे नदी को फिर प्रवाहित करते हैं। जाह्नवी नाम जह्नु से इसी संबंध की स्मृति है। स्वर्ग से अवतरण हो जाने पर भी भगीरथ का प्रयत्न तुरंत पूरा नहीं होता; एक नई बाधा और नया अनुग्रह सामने आता है।
अंत में नदी उस स्थान तक पहुँचती है जहाँ सगर के पुत्र भस्म रूप में हैं। उसके स्पर्श से पूर्वजों के लिए चला आ रहा प्रयास पूर्ण होता है। धारा के साथ भगीरथ का नाम इसलिए बचा रहता है कि कथा दिव्य उदारता के साथ मानवीय धैर्य को भी सँजोती है। कठिन और व्यापक हित वाले कार्य को आज भी भगीरथ प्रयास कहना इसी स्मृति से जुड़ा है।
महाभारत में शांतनु से विवाह के बाद वे देवव्रत, अर्थात भीष्म, की माता हैं। यह उनकी कथा की दूसरी महत्वपूर्ण धारा है, जिसे भगीरथ की तपस्या से अलग संदर्भ में पढ़ना चाहिए।
महाभारत में इस मातृत्व की पृष्ठभूमि करुण है। आठ वसुओं को पृथ्वी पर जन्म लेना है और गंगा उनकी माता बनती हैं। शांतनु ने उनके कार्यों पर प्रश्न न करने का वचन दिया था, पर आठवें बालक को नदी में ले जाते समय वे उन्हें रोकते हैं। तब गंगा वसुओं का वृत्तांत बताती हैं और जीवित बालक को लेकर चली जाती हैं। शिक्षा पूरी होने पर देवव्रत को पिता के पास लौटाया जाता है। भीष्म के साथ गंगा के संबंध में वियोग, पालन और पृथ्वी पर जन्म से पहले जुड़े विधान की पूर्ति, तीनों हैं।
गंगा की कथा बहती हुई उपस्थिति के रूप में आगे बढ़ती है। उनके तटों पर तीर्थ, पूर्वजों का स्मरण और दैनिक पूजा जुड़े हैं। माता के रूप में पूजित नदी की कथा उसके जल और उससे पलने वाले जीवन की देखभाल का दायित्व भी जगाती है।

