आरती श्री जगन्नाथ मंगलकारी,परसत चरणारविंद आपदा हारी।
निरखत मुखारविंद आपदा हारी,कंचन थार धूप दीप ज्योति जगमगी।
अग्निकुंड घिरत पाव-पाव साथरी।
॥ आरती श्री जगन्नाथ मंगलकारी॥
देवन द्वारे ठाढ़े रोहिणी खड़ी,मार्कण्डेय श्वेत गंगा आन के भरी।
गरुड़ खंभ सिंह पौर यात्रा जुड़ी,यात्रा की भीड़ बहुत बेंत की छड़ी।
॥ आरती श्री जगन्नाथ मंगलकारी॥
धन्य धन्य सुरश्याम आज की घड़ी।
॥ आरती श्री जगन्नाथ मंगलकारी॥

