जगन्नाथ जी

जगन्नाथ जी

जगन्नाथ जी, जगत के नाथ, करुणामय कृष्ण-विष्णु रूप हैं जो हर भक्त को प्रेम से स्वीकार करते हैं।

जगन्नाथ मूल मंत्र

ॐ जगन्नाथाय नमः

दिन

गुरुवार

रंग

पीला

भोग

फल

पर्व

जगन्नाथ रथ यात्रा

जन्माष्टमी

संक्षिप्त तथ्य

मुख्य धाम

श्री जगन्नाथ मंदिर, पुरी

मुख्य भाव

सार्वभौम करुणा, कृष्ण भक्ति और साझा प्रसाद

जगन्नाथ जी की कथा और आध्यात्मिक महत्व

अर्थ, उपासना और उपलब्ध पाठ को समझने के लिए संक्षिप्त परिचय।

जगन्नाथ जी, जगत के नाथ, करुणामय कृष्ण-विष्णु रूप हैं जो हर भक्त को प्रेम से स्वीकार करते हैं।

जगन्नाथ जी की कथा

जगन्नाथ जी को संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी के रूप में पूजा जाता है और वे भगवान विष्णु तथा भगवान श्रीकृष्ण के सबसे प्रिय स्वरूपों में से एक हैं। उनकी मुख्य रूप से ओडिशा के पवित्र नगर पुरी में पूजा की जाती है, जहाँ हर वर्ष लाखों श्रद्धालु उनके दर्शन और आशीर्वाद के लिए आते हैं। 'जगन्नाथ' का अर्थ है 'जगत के नाथ' अर्थात् संपूर्ण सृष्टि के स्वामी। यह नाम दर्शाता है कि भगवान सभी के हैं, चाहे उनकी जाति, समुदाय, राष्ट्रीयता या सामाजिक स्थिति कुछ भी हो।
श्री जगन्नाथ की उपासना की परंपरा अत्यंत प्राचीन है और इसमें वैदिक, वैष्णव, जनजातीय तथा भक्तिमार्गीय परंपराओं का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। भगवान जगन्नाथ की पूजा उनके बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ की जाती है। इनके अद्वितीय काष्ठ स्वरूप पुरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में प्रतिष्ठित हैं, जो भारत के सबसे पवित्र तीर्थस्थलों में से एक माना जाता है।
लोकप्रिय कथा के अनुसार मालवा के राजा इन्द्रद्युम्न भगवान विष्णु के दिव्य स्वरूप नील माधव के दर्शन करना चाहते थे। लंबे समय तक खोज करने के बाद उन्हें ज्ञात हुआ कि भगवान एक वन मंदिर में गुप्त रूप से विराजमान हैं। जब राजा उस पवित्र स्थान पर पहुँचे, तब तक नील माधव का स्वरूप अदृश्य हो चुका था। किंतु उन्हें दिव्य आदेश प्राप्त हुआ कि वे एक भव्य मंदिर का निर्माण करें और वहाँ भगवान की स्थापना करें।
कुछ समय बाद भगवान पवित्र काष्ठ खंडों के रूप में प्रकट हुए, जिन्हें 'दारु ब्रह्म' कहा जाता है। ये दिव्य लकड़ियाँ समुद्र तट पर बहकर आईं। भगवान विश्वकर्मा एक बढ़ई का रूप धारण करके मूर्तियाँ बनाने के लिए तैयार हुए, परंतु उन्होंने शर्त रखी कि कार्य पूर्ण होने तक कोई उन्हें बाधित नहीं करेगा। किंतु राजा ने अधीर होकर समय से पहले द्वार खोल दिया। तब भगवान के स्वरूप बड़े नेत्रों और अधूरे अंगों के साथ दिखाई दिए। उसी समय आकाशवाणी हुई कि भगवान इसी स्वरूप में पूजित होना चाहते हैं। इस प्रकार भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के अद्वितीय स्वरूप प्रकट हुए।

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