॥ दोहा ॥
जय नन्दी शिव द्वारपाल,गणपति के संगी हो।
शिव पार्वती के प्रिय भक्त,मंगल के अंगी हो॥
शिलाद मुनि के नन्दन तुम,धर्म धुरन्धर नाम।
चरण शरण में आया हूँ,करो सफल सब काम॥
॥ चौपाई ॥
जय नन्दी महाराज महाबली।शिव शंकर के प्रिय वृषभ अली॥
तुम्हरी कृपा जगत पर छाई।भक्त जनों की मुराद बन आई॥
श्वेत वर्ण तन दिव्य सुहावन।शृंग सुनहरे मन को भावन॥
गले में माला फूलन वाली।महादेव की शोभा न्यारी॥
शिलाद ऋषि ने तप किया भारी।पुत्र रूप में तुम पधारी॥
यमराज से लिया वर दाना।तुम अमर अजर हुए महाना॥
शिव भक्ति में लीन तुम भाये।महादेव ने हृदय लगाये॥
गणों के अधिपति पद पाया।शिव दरबार में मान बढ़ाया॥
कैलाश द्वार के रक्षक भारे।देवन में तुम सबसे न्यारे॥
बिना अनुमति नहीं कोई जाई।नन्दी की आज्ञा बिन न घुसपाई॥
रावण आया घमण्ड उठाये।नन्दी से अपमान मुँह पाये॥
श्राप दिया वानर बल से।लंका जली उसी फल से॥
शिव पुराण में महिमा गाई।नन्दी की कथा जग में छाई॥
स्कन्द पुराण में वर्णन भारी।नन्दी कीर्ति अपरम्पारी॥
महादेव के पट जब खुलते।नन्दी दर्शन पहले मिलते॥
नन्दी के कान में जो माँगे।मनोकामना पूरी होय आगे॥
वृषभ रूप धर धर्म दिखाते।चार चरण चारों पग सजाते॥
सत्य तप दान अरु दया भाई।चारों धर्म तुम में समाई॥
तांडव नृत्य शिव जब करते।नन्दी मृदंग ताल को धरते॥
डमरू की ध्वनि में खो जाते।नन्दी संग शिव खूब नचाते॥
शिव की बारात में सजते।नन्दी आगे सबसे चलते॥
पार्वती विवाह में साजे।नन्दी महाराज बाजे-गाजे॥
समुद्र मंथन के समय भारी।नन्दी ने की सेवा सारी॥
हलाहल विष जब शिव पिया।नन्दी ने संग साथ दिया॥
शिव के ध्यान में बैठे रहते।भक्तों के दुःख मन में सहते॥
विनती करते हरि से तुम्हारी।भक्त जनों की करो पुकारी॥
ज्योतिर्लिंग के आगे विराजो।भक्त जनों के हृदय में गाजो॥
बारह ज्योतिर्लिंग हर द्वारा।नन्दी विराजे अति उजियारा॥
काशी विश्वनाथ के आगे।नन्दी बैठे जग अनुरागे॥
नन्दी मुख में झाँक के देखें।शिवलिंग दर्शन सुख को लेखें॥
सोमनाथ में तुम मुसकाते।रामेश्वर में दर्शन पाते॥
केदारनाथ की शोभा भारी।नन्दी देव की महिमा न्यारी॥
उग्र रूप में दुष्टन भगाते।साधुजनों को अभय दिलाते॥
शान्त रूप में भक्तन भाते।दर्शन दे के मन हर्षाते॥
संगीत शास्त्र के ज्ञाता तुम हो।नृत्य कला के दाता तुम हो॥
नन्दिकेश्वर नाम तुम पाये।शिव के प्रिय शिष्य कहाये॥
कामशास्त्र का ज्ञान सिखाया।नन्दी ने जग को समझाया॥
आगम शास्त्र के रचनाकारा।नन्दी का ज्ञान अति विस्तारा॥
शिव कथा जो सुनना चाहें।नन्दी के द्वारे ही आयें॥
शिव रहस्य नन्दी ने जाने।त्रिलोक में नहीं कोई माने॥
जो भक्त नन्दी पर जल चढ़ाये।शिव की कृपा वह शीघ्र पाये॥
बेलपत्र अर्पण जो करता।मनोकामना पूरी वह करता॥
सावन मास में पूजन करते।नन्दी कृपा से पुण्य भरते॥
सोमवार व्रत जो नर राखे।नन्दी दर्शन मन में आखे॥
सन्तान हीन जो नर दुखियारे।नन्दी पूजन से दुःख निवारे॥
पुत्र रत्न की प्राप्ति होवे।भक्त का जीवन सुख से सोवे॥
विवाह बाधा दूर हो जाई।नन्दी कृपा से शुभ घड़ी आई॥
दाम्पत्य सुख का वरदान पाते।नन्दी भक्त सुखी घर जाते॥
रोग व्याधि जो तन को सताये।नन्दी स्मरण से दूर भगाये॥
आयु बल बुद्धि दो स्वामी।नन्दी तुम अन्तर्यामी॥
शत्रु नाश हो नन्दी कृपा से।भय दूर भागे शिव प्रभा से॥
कोर्ट कचहरी जय होय भाई।नन्दी भक्त की हो भलाई॥
धन सम्पत्ति घर भर भर आवे।नन्दी की जय जय कार मचावे॥
व्यापार में उन्नति होई।नन्दी भक्त दुखी न कोई॥
ग्रह दोष नन्दी हर लेते।शनि राहु केतु भय मेटे॥
मंगल दोष दूर हो जाई।नन्दी कृपा नित बनी रहाई॥
तीर्थ यात्रा में साथ चलते।भक्त के हर संकट को टलते॥
चारों धाम के पुण्य दिलाओ।नन्दी कृपा दृष्टि बरसाओ॥
मृत्यु भय से भक्त बचाते।शिव धाम का मार्ग दिखाते॥
काल की गति को रोकने वाले।नन्दी भक्त का हाथ थामने वाले॥
बुद्धि विवेक का ज्ञान दो मुझे।सत्य असत्य का भान दो मुझे॥
मोह माया से मुक्त करो।नन्दी शिव की राह पकड़ो॥
अष्टसिद्धि नवनिधि के दाता।शिव भक्तों के परम विधाता॥
नन्दी कृपा जिस पर होई।जग में उसे रोके न कोई॥
भूत प्रेत का भय मिटाओ।तन्त्र मन्त्र का असर हटाओ॥
नन्दी नाम का स्मरण जो करे।काल भी उससे दूर रहे॥
शिव परिवार के रखवाले।देवों में तुम सबसे सम्भाले॥
कार्तिकेय गणेश के साथी।नन्दी शिव सेवा के साथी॥
प्रदोष काल में तुम पूजाते।भक्त को वांछित फल दिलाते॥
प्रदोष व्रत जो नर करे भाई।नन्दी शिव की कृपा समाई॥
महाशिवरात्रि पर तुम शोभे।भक्त जनों के मन को मोहे॥
रात्रि चतुर्थ प्रहर जो जागे।नन्दी कृपा उसे तुरत लागे॥
शिव के कान की बात सुनाओ।भक्त की अरजी हरि तक पहुँचाओ॥
मध्यस्थ बनो शिव भक्त के।पूरे करो काम सब नेक के॥
नन्दी चालीसा जो पढ़े नित।होत सफल उसके सब नित॥
शिव कृपा के संग नन्दी कृपा।दूर होत सब दुःख और तपा॥
सात बार जो पाठ करे कोई।मनवाँछित फल पावे सोई॥
इक्कीस दिन जो नेम निभाये।नन्दी शिव की भक्ति पाये॥
नन्दी चालीसा सम्पूर्ण भई।शिव नन्दी कृपा मन में नई॥
भव बाधा सब दूर हो जाई।जन्म जन्म की मुक्ति कमाई॥
॥ दोहा ॥
नन्दी चालीसा पाठ ते,मिटे विपद सब आय।
शिव कृपा संग नन्दी की,नित नित होत सहाय॥
शिलाद नन्दन नन्दी प्रभु,कैलाश के द्वारपाल।
चरण शरण में रखो सदा,रखो सदा खुशहाल॥

