वैष्णव परंपराओं में भगवान विष्णु जगत के सनातन पालक हैं। क्षीरसागर में अनंत शेष पर विराजमान नारायण का पौराणिक रूप नई सृष्टि के आरंभ से जुड़ा है। लक्ष्मी उनकी दिव्य संगिनी हैं और नाभिकमल पर ब्रह्मा का प्राकट्य सृष्टि के विस्तार की भूमिका बनता है।
समुद्र मंथन में सहायता
देवताओं और असुरों ने अमृत के लिए समुद्र मंथन किया। मथानी बना पर्वत डूबने लगा तो विष्णु ने कूर्म रूप में उसे आधार दिया। अमृत के बँटवारे का विवाद होने पर वे मोहिनी रूप में प्रकट हुए। इस कथा में पालन का अर्थ कभी सहारा देना है, तो कभी उचित समय पर हस्तक्षेप करना।
कूर्म की भूमिका जल के नीचे होने के कारण कभी-कभी कथा सुनते समय ध्यान से छूट जाती है। समुद्र से रत्न मिलने से पहले मंदराचल को स्थिर आधार चाहिए था। विष्णु ने वह आधार दिया और दोनों पक्षों का श्रम आगे बढ़ा। अमृत प्रकट होने पर उसके अधिकार को लेकर नया संकट आया। मोहिनी का प्रसंग उस संघर्ष को देवताओं के पक्ष में परिणत करता है। एक ही कार्य में भगवान की दो भिन्न भूमिकाएँ दिखाई देती हैं—पहले उसका भार सँभालना और फिर उसके परिणाम को दिशा देना।
अलग संकटों में अलग अवतार
वराह रूप में विष्णु पृथ्वी का उद्धार करते हैं। नरसिंह रूप में वे प्रह्लाद की रक्षा करते हैं। वामन बनकर वे बलि से तीन पग भूमि माँगते हैं और विराट रूप प्रकट करते हैं। राम और कृष्ण के अवतारों की अपनी विस्तृत जीवनकथाएँ हैं। दशावतार की सूचियों में परंपरा के अनुसार अंतर मिलता है; भागवत में इनके अतिरिक्त भी अनेक अवतार वर्णित हैं।
वामन और बलि की भेंट एक छोटी-सी याचना से आरंभ होती है। राजा तीन पग भूमि देने को तैयार हैं, पर दिव्य अतिथि उनके अनुमान से कहीं व्यापक रूप धारण कर लेते हैं। लोकों के नप जाने पर साधारण भूमि देकर वचन पूरा करना संभव नहीं रहता। बलि स्वयं को अर्पित करते हैं। भागवत इस कथा को अधिकार छिनने तक सीमित नहीं रखता; आगे सुतल में उन्हें मिले आश्रय का वर्णन भी आता है। दान, परीक्षा और भगवान का सतत संरक्षण—तीनों इस मिलन के अंग हैं।
गजेंद्र की कथा में एक हाथी मगरमच्छ से संघर्ष करते हुए अपनी शक्ति खो देता है और भगवान की शरण में पुकारता है। विष्णु उसकी सहायता को आते हैं। भक्त इस प्रसंग में असहाय की पुकार सुनने वाले नारायण का दर्शन करते हैं।
गजेंद्र के साथी उसे छुड़ा नहीं पाते और लंबे संघर्ष में उसका परिचित बल क्षीण होने लगता है। उसकी प्रार्थना केवल पुराने सुख को वापस पाने की इच्छा नहीं रहती। परम आश्रय का स्मरण करके वह कमल अर्पित करता है। विष्णु गरुड़ के साथ आते हैं और मगर का बंधन समाप्त करते हैं। विस्तृत कथा में हाथी और मगर, दोनों के पूर्वजन्मों का संबंध भी बताया गया है। इस प्रकार सरोवर में हुआ संघर्ष दोनों के उद्धार के प्रसंग में बदल जाता है।
विष्णु की कथा किसी एक जन्म और मृत्यु तक सीमित नहीं है। अवतारों की लीलाओं के आरंभ और पूर्णता हैं, जबकि वैष्णव विश्वास में नारायण का अस्तित्व सनातन है। शंख, चक्र, गदा और कमलधारी उनका स्वरूप बार-बार संकट में पड़ते जगत के संरक्षण का आश्वासन देता है।

