
श्री वेंकटेश्वर बालाजी
भगवान वेंकटेश्वर, जिन्हें श्रीनिवास और बालाजी भी कहते हैं, तिरुमला में विष्णु के स्वरूप के रूप में पूजित हैं। मंदिर की कथा अनेक पौराणिक परंपराओं को साथ लेकर बताती है कि भगवान ने भक्तों के लिए वेंकट पर्वत पर निवास किया।
वेंकटेश मूल मंत्र
ॐ नमो वेंकटेशाय
दिन
गुरुवार
रंग
पीला
भोग
पंचामृत
पर्व
वैकुंठ एकादशी
तिरुपति ब्रह्मोत्सव
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श्री वेंकटेश्वर बालाजी के नाम का अर्थ
वेंकटेश्वर का अर्थ है “वेंकट पर्वत के स्वामी”। वेंकट पवित्र पर्वत का नाम है और ईश्वर का अर्थ स्वामी है। तिरुमला में पूजित विष्णु के इस स्वरूप को भक्त आदर से बालाजी भी कहते हैं।
वेंकटेश्वर बालाजी: श्रीनिवास और पद्मावती की कथा
भगवान वेंकटेश्वर, जिन्हें श्रीनिवास और बालाजी भी कहते हैं, तिरुमला में विष्णु के स्वरूप के रूप में पूजित हैं। मंदिर की कथा अनेक पौराणिक परंपराओं को साथ लेकर बताती है कि भगवान ने भक्तों के लिए वेंकट पर्वत पर निवास किया।
लक्ष्मी का प्रस्थान और श्रीनिवास का पृथ्वी पर निवास
मंदिर की कथा में भृगु ऋषि दिव्य लोकों की यात्रा करते हुए विष्णु के वक्ष पर प्रहार करते हैं। उस वक्ष में निवास करने वाली लक्ष्मी दुखी होकर चली जाती हैं। विष्णु श्रीनिवास रूप में पृथ्वी पर आते हैं। पर्वतों में उनके निवास के दौरान वकुला देवी उनकी माता के समान देखभाल करती हैं।
तिरुमला की कथा में श्रीनिवास एक बाँबी में रहते हैं और एक गाय उन्हें अपने दूध से पोषण देती है। गाय का दूध न मिलने पर चिंतित लोगों की ओर से ग्वाला उसका पीछा करता है और क्रोध में प्रहार करने को होता है। भगवान गाय की रक्षा करते हुए आघात अपने ऊपर लेते हैं। आगे राजसी वैभव में पूजे जाने वाले देवता की कथा में यह करुणा का प्रसंग पहले आता है। भव्य विवाह और मंदिर की महिमा से पहले एक छिपा आश्रय, प्रतिदिन दिया गया पोषण और हिंसा से बचाया गया जीवन है।
यह पवित्र क्षेत्र पहले से वराह से जुड़ा माना जाता है। तिरुमला की परंपरा वराहस्वामी को विशेष सम्मान देती है और श्रीनिवास के निवास को उनकी अनुमति से जोड़ती है। इस प्रकार कथा मंदिर को पहले से पवित्र माने गए स्थान में स्थापित करती है।
वकुला देवी का स्थान विशेष रूप से आत्मीय है। तिरुमला परंपरा उन्हें यशोदा से जोड़ती है, जिनकी कृष्ण का विवाह देखने की इच्छा इस प्राकट्य में पूरी होती है। श्रीनिवास की आवश्यकताओं की देखभाल से लेकर उनके विवाह की बात आगे बढ़ाने तक वकुला की भूमिका रहती है। उनके माध्यम से एक लीला में अधूरी रही माँ की अभिलाषा दूसरी लीला में पूरी होती दिखाई देती है।
पद्मावती से विवाह
आकाशराज द्वारा पाली गई राजकुमारी पद्मावती का श्रीनिवास से मिलन होता है। विवाह की इच्छा, वकुला देवी की सहायता और परिवारों की तैयारी से कथा आगे बढ़ती है। विवाह के लिए कुबेर से ऋण लेने का प्रसंग इसी मंदिर परंपरा का प्रसिद्ध हिस्सा है।
विवाह-कथा में पद्मावती को आकाशराज द्वारा कमल पर प्राप्त बालिका बताया गया है। उनका नाम और पालन-पोषण राजपरिवार को एक दिव्य उपहार से जोड़ते हैं। श्रीनिवास से भेंट के बाद परिवारों के बीच संदेश और विवाह की व्यवस्था का क्रम चलता है। वकुला की भूमिका में स्नेह और व्यावहारिक देखभाल साथ रहते हैं। कुबेर से लिए गए धन से उत्सव की व्यवस्था होती है और बाद के भक्त अपने अर्पण से उसकी स्मृति से जुड़ते हैं।
पद्मावती परिणयम् का वार्षिक उत्सव इसी विवाह को याद करता है। वह गर्भगृह में वेंकटेश्वर की नित्य उपस्थिति के साथ उनके स्मरण का एक अन्य अवसर बनता है। शोभायात्रा, विवाह और पारिवारिक स्नेह पर्वत पर विराजमान भगवान की स्थिर प्रतिमा के पीछे की कथा को जीवंत करते हैं। इस तीर्थ में विष्णु की महिमा और श्रीनिवास के संबंधों की आत्मीयता, दोनों साथ हैं।
भक्त अपनी भेंट को भगवान के विवाह और तिरुमला की सेवा से जोड़ते हैं। यह भक्तिपरक आख्यान है, भेंट के बदले व्यक्तिगत आर्थिक लाभ का वादा नहीं।
कथा वेंकटेश्वर के पर्वत पर स्थायी सान्निध्य तक पहुँचती है। उनका वर्णन किसी मानवीय मृत्यु से समाप्त नहीं होता। लक्ष्मी से संबंध, पद्मावती से विवाह और वकुला देवी का मातृस्नेह गर्भगृह के भव्य स्वरूप के साथ आत्मीयता भी जोड़ते हैं।
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