
श्री वेंकटेश्वर बालाजी
बालाजी, जिन्हें वेंकटेश्वर और श्रीनिवास भी कहा जाता है, भगवान विष्णु का करुणामय रूप हैं जो भक्तों को रक्षा, श्रद्धा, समृद्धि और मन की स्थिरता प्रदान करते हैं।
वेंकटेश मूल मंत्र
ॐ नमो वेंकटेशाय
दिन
गुरुवार
रंग
पीला
भोग
पंचामृत
पर्व
वैकुंठ एकादशी
तिरुपति ब्रह्मोत्सव
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संक्षिप्त तथ्य
मुख्य धाम
तिरुमला, तिरुपति
मुख्य भाव
रक्षा, भक्ति, समृद्धि और भगवान विष्णु के चरणों में समर्पण
श्री वेंकटेश्वर बालाजी की कथा और आध्यात्मिक महत्व
अर्थ, उपासना और उपलब्ध पाठ को समझने के लिए संक्षिप्त परिचय।
बालाजी, जिन्हें वेंकटेश्वर और श्रीनिवास भी कहा जाता है, भगवान विष्णु का करुणामय रूप हैं जो भक्तों को रक्षा, श्रद्धा, समृद्धि और मन की स्थिरता प्रदान करते हैं।
भगवान वेंकटेश्वर बालाजी की कथा
भगवान वेंकटेश्वर बालाजी जिन्हें तिरुपति बालाजी, श्रीनिवास, गोविंदा और वेंकटरमण के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में सबसे अधिक पूजनीय और प्रसिद्ध देवताओं में से एक हैं। वे भगवान विष्णु के साक्षात अवतार माने जाते हैं और आंध्र प्रदेश के तिरुमला पर्वत पर विराजमान हैं। उनका पावन धाम तिरुपति विश्व के सर्वाधिक दर्शनार्थियों वाले तीर्थस्थलों में से एक है। भक्त उन्हें सम्पूर्ण जगत के पालनकर्ता, मोक्षदाता और समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण करने वाले प्रभु के रूप में पूजते हैं।
भगवान वेंकटेश्वर की कथा का आरंभ उस समय से होता है जब एक बार भृगु ऋषि ने ब्रह्मांड के सर्वश्रेष्ठ देव की परीक्षा लेने का निश्चय किया। वे पहले ब्रह्मा जी के पास गए, परंतु ब्रह्मा जी अपनी साधना में इतने तल्लीन थे कि उन्होंने ऋषि की उपेक्षा की। फिर भृगु ऋषि शिव जी के पास गए, परंतु वहाँ भी उन्हें उचित आदर नहीं मिला।
अंत में भृगु ऋषि भगवान विष्णु के पास वैकुंठ धाम पहुँचे। वहाँ भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर विश्राम कर रहे थे। ऋषि की उपेक्षा हुई देखकर क्रोधित भृगु ने भगवान विष्णु की छाती पर लात मार दी। भगवान विष्णु ने क्रोध न करके भृगु ऋषि के पैर पकड़े और पूछा कि उनके कठोर पैर को कोई चोट तो नहीं आई। ऋषि भृगु भगवान की इस परम सहनशीलता और विनम्रता से अत्यंत प्रभावित हुए और उन्हें सर्वश्रेष्ठ देव घोषित किया।
परंतु इस घटना से माता लक्ष्मी को अत्यंत क्लेश हुआ। उन्हें लगा कि उनके पति के वक्षस्थल पर, जो उनका निवास स्थान था, किसी ने आघात किया और भगवान विष्णु ने उसे सहन कर लिया। रुष्ट होकर माता लक्ष्मी वैकुंठ छोड़कर पृथ्वी पर कोल्हापुर क्षेत्र में चली गईं और वहाँ तपस्या में लीन हो गईं।
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